कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने इस मुद्दे पर सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि किसी मुख्यमंत्री या प्रशासन की यह हैसियत नहीं है कि वह तय करे कि शंकराचार्य कौन है और कौन नहीं। उन्होंने कहा कि शंकराचार्य पद कोई सरकारी नियुक्ति नहीं बल्कि गुरु-शिष्य की अखंड परंपरा से जुड़ा हुआ है जिसे सदियों से मठ परंपराओं के तहत स्वीकार किया जाता रहा है।दरअसल विवाद तब शुरू हुआ जब मौनी अमावस्या के अवसर पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को स्नान करने से कथित तौर पर मेला पुलिस और प्रशासन ने रोक दिया। इसके बाद मेला प्रशासन की ओर से उन्हें एक नोटिस जारी किया गया जिसमें यह पूछा गया कि वह स्वयं को ज्योतिष्पीठ का शंकराचार्य किस आधार पर प्रचारित कर रहे हैं। इसी नोटिस को लेकर कांग्रेस ने बीजेपी सरकार पर तीखा प्रहार किया है।
पवन खेड़ा ने तंज कसते हुए कहा कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के सामने नतमस्तक होते हैं तब तक वह शंकराचार्य होते हैं। जब वह गौ मांस पर सरकार से सवाल नहीं पूछते तब तक वह शंकराचार्य होते हैं। जब तक वह आधे-अधूरे मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का विरोध नहीं करते तब तक उनकी मान्यता बनी रहती है। लेकिन जैसे ही वह सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हैं और सत्ता के सामने झुकने से इनकार करते हैं अचानक उनसे कागज मांगे जाने लगते हैं।
खेड़ा ने इसे लोकतंत्र और धार्मिक स्वतंत्रता दोनों पर हमला बताते हुए कहा कि बीजेपी पहले मुसलमानों से कागज दिखाओ कहती थी और अब वही मानसिकता शंकराचार्य तक पहुंच गई है। उन्होंने याद दिलाया कि 1954 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया था कि किसी भी मठ या धार्मिक संस्था के संचालन में सरकार को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। ऐसे में योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा जारी किया गया नोटिस न सिर्फ असंवैधानिक है बल्कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी खुला उल्लंघन है।कांग्रेस नेता ने यह भी कहा कि पूरा देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इस मुद्दे पर मौन को देख रहा है और देश इस चुप्पी को कभी माफ नहीं करेगा। कांग्रेस ने संकेत दिए हैं कि अगर सरकार ने इस रवैये में बदलाव नहीं किया तो वह इस मुद्दे को और बड़े स्तर पर उठाएगी।
