क्या है खास बात?
ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को पहले से दो पीठों का समर्थन मिल चुका है। उनके अनुसार द्वारका शारदा पीठ और शृंगेरी शारदा पीठ के शंकराचार्य उन्हें ज्योतिषपीठ के वैध शंकराचार्य के रूप में मान्यता देते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि पिछले माघ मेले के दौरान इन दोनों पीठों के शंकराचार्यों ने उनके साथ संगम में स्नान किया था, जो उनकी मान्यता का प्रतीक माना जाता है।
अब यदि तीसरी पीठ का समर्थन भी मिल जाता है, तो विवाद में बड़ी राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
गो रक्षा आंदोलन और शंकराचार्यों की सक्रियता
गो रक्षा आंदोलन को लेकर चारों शंकराचार्य पहले से ही सक्रिय हैं।
गाय की रक्षा के व्रत के लिए शंकराचार्य निश्चलानंद ने सिंहासन और छत्र का त्याग भी कर रखा है। ऐसे में चारों शंकराचार्यों का एक मंच पर आना यह संकेत होगा कि अविमुक्तेश्वरानंद पर सभी शंकराचार्यों की सहमति बनती जा रही है।
आयोजन के लिए सभी शंकराचार्यों को आमंत्रण भेजने की तैयारी भी बताई जा रही है।
चारों शंकराचार्यों का एक मंच पर दिखना धार्मिक इतिहास में तीसरी बार होगा।
पहली बार 1779 में श्रृंगेरी में पहला चतुष्पीठ सम्मेलन हुआ था।
दूसरी बार 19 मई 2007 को बेंगलुरु में रामसेतु मुद्दे पर सम्मेलन में चारों शंकराचार्य एक साथ थे।
इसके बाद जून 1993 में भी शृंगेरी में एक ऐतिहासिक बैठक हुई थी, जिसमें राष्ट्रीय अखंडता और शांति के लिए चारों शंकराचार्यों ने संयुक्त घोषणा पत्र जारी किया था।
अगर दिल्ली में 10 मार्च 2026 का यह आयोजन सफल होता है, तो इसे सनातन परंपरा के लिए एक ऐतिहासिक क्षण माना जाएगा।
हाल ही में महाकुंभ और अन्य धार्मिक आयोजनों के दौरान शंकराचार्यों के एक साथ आने की चर्चा रही है, जो इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है। गो रक्षा आंदोलन को लेकर पहले भी कई बड़े आंदोलन हुए हैं, और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद भी इस विषय पर कई बार खुलकर बोल चुके हैं।
इसलिए दिल्ली में होने वाले संभावित आयोजन पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि यह न केवल धार्मिक एकता का संदेश देगा, बल्कि ज्योतिषपीठ विवाद में भी संतुलन और समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है।
