नंदीग्राम में शुभेंदु अधिकारी की सभा के बाद तृणमूल कांग्रेस के पवित्र कर के घर के बाहर ‘चोरचोर’ के नारे लगने से सियासी तापमान और बढ़ गया है। वहीं, मतदाता सूची संशोधन एसआईआर की सप्लीमेंट्री लिस्ट जारी होने से पहले लाखों नामों के जोड़-घटाव को लेकर चुनाव आयोग अलर्ट मोड पर है। इस बार मुकाबला केवल राजनीतिक दलों के बीच नहीं, बल्कि जमीनी तनाव, वोटिंग गणित और प्रशासनिक सतर्कता के बीच तय होगा।
हाईवोल्टेज सीटें: भवानीपुर और नंदीग्राम
भवानीपुर और नंदीग्राम हमेशा से तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच प्रत्यक्ष मुकाबले की सीट रही हैं। अब हुमायूं कबीर ने भवानीपुर में पूनम बेगम और नंदीग्राम में शाहिदुल हक को उतारकर इन सीटों को त्रिकोणीय संघर्ष का मैदान बना दिया है।
भवानीपुर में मुस्लिम और अल्पसंख्यक वोट निर्णायक
भवानीपुर में ममता बनर्जी की प्रतिष्ठा दांव पर है। इस सीट पर मुस्लिम और अल्पसंख्यक वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभाता है, जो अब तक तृणमूल के साथ रहा है। एजेयूपी की एंट्री से इस वोट बैंक में सेंध लग सकती है। यदि हुमायूं का प्रभाव स्थानीय स्तर पर मजबूत नहीं रहा, तो तृणमूल को बड़ा नुकसान नहीं होगा, लेकिन मामूली वोट कटाव भी करीबी मुकाबले में भाजपा के लिए लाभदायक साबित हो सकता है।
नंदीग्राम में बहुकोणीय मुकाबला
नंदीग्राम में पहले से शुभेंदु अधिकारी और ममता बनर्जी के बीच सीधी टक्कर रही है। अब एजेयूपी की एंट्री विपक्षी वोटों के बिखराव की संभावना बढ़ा रही है। मुस्लिम और ग्रामीण वोट बैंक पहले ही विभाजित है, और हुमायूं का उम्मीदवार इसे और जटिल बना सकता है, जिससे भाजपा को अप्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है, खासकर तब जब तृणमूल विरोधी वोट एकजुट न हों।
विश्लेषकों का कहना है कि छोटी पार्टियों का प्रभाव सीधे जीत पर कम होता है, लेकिन 2-5% वोट शेयर के जरिए वे चुनाव के नतीजों की दिशा बदल सकते हैं। भवानीपुर में यह तृणमूल के लिए चुनौती और नंदीग्राम में भाजपा के लिए अप्रत्यक्ष लाभ साबित हो सकता है।
