सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ ने उन लोगों पर भी तीखी टिप्पणी की, जो कुत्तों को सड़क पर खाना खिलाते हैं और खुद को उनका हितैषी मानते हैं।
एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी के कथन कि आवारा कुत्तों का मुद्दा भावनात्मक है, पर बेंच ने जवाब दिया कि अब तक भावनाएं सिर्फ कुत्तों के लिए ही दिखाई दी हैं। गुरुस्वामी ने इसके जवाब में कहा कि वह इंसानों के लिए भी उतनी ही चिंतित हैं।
सुप्रीम कोर्ट में कुत्ते के काटने की शिकार एक महिला ने भी अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि वह इस बात से सहमत हैं कि अगर एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) कार्यक्रम को सही तरीके से लागू किया जाए, तो कुत्तों की संख्या और उनकी आक्रामकता दोनों नियंत्रित की जा सकती हैं।
पीड़िता ने बताया कि वह कुत्ता लंबे समय से क्रूरता का शिकार रहा था। लोग उसे लात मारते, पत्थर फेंकते थे, जिससे उसमें डर और रक्षात्मक आक्रामकता पैदा हो गई थी। महिला ने कहा कि वह किसी और की क्रूरता की सजा भुगत रही थीं, जबकि उसकी कोई गलती नहीं थी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका इरादा सड़कों से हर कुत्ते को हटाने का नहीं है। अदालत ने कहा कि उसके निर्देश पशु जन्म नियंत्रण नियमों के तहत आवारा कुत्तों के प्रबंधन से संबंधित हैं। कोर्ट ने यह भी बताया कि कुत्ते उन लोगों को पहचान सकते हैं जो उनसे डरते हैं या जिन्हें पहले काटा गया हो, और ऐसे लोगों पर हमला कर सकते हैं।
सीनियर वकील सी यू सिंह ने अदालत को बताया कि दिल्ली जैसे शहरों में चूहों की समस्या गंभीर है और बंदरों का आतंक भी एक अलग चुनौती है।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी स्पष्ट संकेत देती है कि आवारा कुत्तों का मुद्दा सिर्फ जानवरों का नहीं, बल्कि आम लोगों की सुरक्षा और प्रशासनिक जिम्मेदारी से जुड़ा गंभीर विषय है। कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि अब लापरवाही की कीमत राज्य सरकारों को मुआवजे के रूप में चुकानी पड़ेगी और समस्या का संतुलित, व्यावहारिक और जिम्मेदार समाधान निकालना ही एकमात्र विकल्प है।
