विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने कहा कि लालू यादव ने रेल मंत्रालय को अपनी निजी जागीर की तरह इस्तेमाल किया ताकि आपराधिक गतिविधियों को अंजाम दिया जा सके। अदालत ने यह भी बताया कि परिवार ने सरकारी नौकरी को सौदेबाजी के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया और रेलवे अधिकारियों तथा अपने करीबी सहयोगियों की मिलीभगत से जमीन हासिल की।
जमीन के बदले नौकरी घोटाला क्या है
इस घोटाले की जड़ लालू यादव के रेल मंत्री (2004-2009) के कार्यकाल से जुड़ी है। आरोप है कि रेलवे के पश्चिम-मध्य जोन, जबलपुर में ग्रुप-डी की नियुक्तियां उन आवेदकों को दी गईं जिन्होंने राजद सुप्रीमो के परिवार या सहयोगियों को जमीन उपहार में दी या हस्तांतरित की।
सीबीआई ने दावा किया कि ये नियुक्तियां नियमों का उल्लंघन करते हुए की गईं और इसमें बेनामी संपत्तियों का उपयोग किया गया, जो आपराधिक कदाचार और साजिश के समकक्ष है। आरोपियों ने इन सभी आरोपों से इनकार किया है और इसे राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए कहा कि यह मामला राजनीतिक साजिश का हिस्सा है।
आज की सुनवाई में कोर्ट सभी आरोपियों पर औपचारिक आरोप तय कर सकती है, जो आगे की मुकदमेबाजी के लिए अहम कदम माना जा रहा है। यह केस न केवल लालू परिवार के राजनीतिक भविष्य, बल्कि भारतीय राजनीति में प्रशासनिक जवाबदेही और भ्रष्टाचार पर निगाह के लिहाज से भी बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
