राजनीतिक पृष्ठभूमि में उत्तरायण 2002
साल 2001 के अंत में गुजरात की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। अक्टूबर 2001 में नरेंद्र मोदी ने केशुभाई पटेल की जगह गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उस समय राज्य कई चुनौतियों से गुजर रहा था। भुज में आए विनाशकारी भूकंप को कुछ ही महीने बीते थे और प्रशासन के सामने पुनर्निर्माण की बड़ी जिम्मेदारी थी। ऐसे माहौल में उत्तरायण 2002 आई, जो लोगों के लिए राहत, उम्मीद और नए उत्साह का अवसर बनी।
मुख्यमंत्री और आम आदमी की दूरी हुई कम
उत्तरायण 2002 के दिन अहमदाबाद में नरेंद्र मोदी ने सरकारी औपचारिकताओं से अलग हटकर एक आम गुजराती की तरह पतंग उड़ाई। वे किसी मंच या कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहे, बल्कि छत पर जाकर मांझे से पतंग थामे दिखाई दिए। उस समय की तस्वीरें और दृश्य तेजी से चर्चा में आए। एक नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री का इस तरह लोकपर्व में शामिल होना लोगों के लिए नया अनुभव था। यह दृश्य केवल एक पतंग उड़ाने तक सीमित नहीं था, बल्कि यह संदेश भी था कि मुख्यमंत्री जनता की संस्कृति, परंपराओं और भावनाओं से जुड़ा हुआ है। लोगों ने इसे एक ऐसे नेता के रूप में देखा, जो सत्ता में आने के बाद भी जमीन से जुड़ा है।
पतंग और गुजरात की पहचान
गुजरात में पतंग उड़ाना सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक जुड़ाव का जरिया है। उत्तरायण के दिन छतों पर परिवार, पड़ोसी और दोस्त इकट्ठा होते हैं। “काई पो चे” की आवाज़ों से माहौल गूंजता है। नरेंद्र मोदी का छत पर पतंग उड़ाना इसी सामूहिक संस्कृति का हिस्सा बन गया। यह एक प्रतीकात्मक क्षण था, जिसमें सत्ता और समाज के बीच की दूरी कुछ समय के लिए मिटती नजर आई।
मीडिया और जनता की प्रतिक्रिया
उत्तरायण 2002 के इस दृश्य को मीडिया ने व्यापक रूप से कवर किया। अखबारों और टीवी चैनलों में मुख्यमंत्री को पतंग उड़ाते हुए दिखाया गया। आम जनता के बीच यह चर्चा का विषय बन गया कि मुख्यमंत्री ने अपने व्यस्त कार्यक्रम से समय निकालकर त्योहार मनाया। कई लोगों ने इसे सकारात्मक संकेत माना कि राज्य का नेतृत्व परंपराओं और जनभावनाओं को महत्व देता है।
राजनीति में सांस्कृतिक प्रतीक
नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन में सांस्कृतिक प्रतीकों का हमेशा खास स्थान रहा है। उत्तरायण 2002 की पतंगबाजी को भी इसी संदर्भ में देखा जाता है। यह एक ऐसा क्षण था, जब उन्होंने खुद को केवल प्रशासक के रूप में नहीं, बल्कि एक गुजराती के रूप में प्रस्तुत किया। बाद के वर्षों में भी वे विभिन्न त्योहारों और सांस्कृतिक आयोजनों में सक्रिय भागीदारी करते रहे, जिससे उनकी छवि एक सांस्कृतिक रूप से जुड़े नेता की बनी।
समय के साथ एक यादगार तस्वीर
आज जब पीछे मुड़कर देखा जाता है, तो उत्तरायण 2002 की वह तस्वीर सिर्फ एक त्योहार की याद नहीं लगती, बल्कि नरेंद्र मोदी के राजनीतिक सफर की शुरुआती झलक भी देती है। उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यही मुख्यमंत्री आगे चलकर देश का प्रधानमंत्री बनेगा। लेकिन पतंग उड़ाते हुए वह दृश्य आज भी लोगों को याद दिलाता है कि बड़े राजनीतिक सफर की शुरुआत भी कभी एक साधारण छत और एक पतंग से हुई थी।
