शिकायत में कहा गया है कि कथित घटनाएं माघ मेला और गुरुकुल परिसर से जुड़ी हैं। शिकायतकर्ता ने दावा किया है कि उनके पास दो नाबालिगों के बयान और दस्तावेजी साक्ष्य मौजूद हैं। प्रारंभिक शिकायत पुलिस को देने के बाद, न्यायालय की शरण ली गई।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने वाराणसी में मीडिया से बातचीत में कहा कि उनके सामाजिक और धार्मिक दृष्टिकोण पर मुखर रुख अपनाने के कारण “बदनाम करने का अभियान” चलाया जा रहा है। उन्होंने भरोसा जताया कि अदालत में आवश्यक साक्ष्य प्रस्तुत कर दिए गए हैं और न्यायपालिका पर उनका पूरा विश्वास है। साथ ही उन्होंने संकेत दिया कि यदि आरोप असत्य पाए जाते हैं, तो झूठी शिकायत के खिलाफ वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।
इस विवाद के पीछे धार्मिक नेतृत्व के बीच मतभेद भी एक महत्वपूर्ण पहलू बन गए हैं। शिकायतकर्ता, जगद्गुरु रामभद्राचार्य के शिष्य बताए जाते हैं, जबकि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पहले भी सार्वजनिक मंचों पर राज्य नीतियों और धार्मिक मुद्दों पर बयान दे चुके हैं, जिससे विवाद और गहराया है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि पॉक्सो जैसे मामलों में नाबालिगों की पहचान की गोपनीयता और साक्ष्यों की विश्वसनीयता निर्णायक होती है। अदालत की निगरानी में जांच आगे बढ़ेगी और इसी दौरान आरोप और बचाव दोनों की कसौटी तय होगी। प्रशासनिक स्तर पर भी शिकायतों की समीक्षा और आवश्यक कार्रवाई की तैयारी चल रही है।
यह विवाद यह भी दर्शाता है कि धार्मिक संस्थाओं और गुरुकुलों में कानूनी निगरानी और पारदर्शिता की आवश्यकता कितनी महत्वपूर्ण है। समाज में धार्मिक नेताओं के व्यक्तित्व और उनके कार्यों के प्रति विश्वास और जवाबदेही दोनों की कसौटी अदालत और साक्ष्यों के सामने आएगी।
आगे की सुनवाई 20 फरवरी को होने वाली है, जहां अदालत दोनों पक्षों के बयान सुनकर आगे की जांच और जवाबी कार्रवाई का रास्ता तय करेगी। इस मामले में कानूनी प्रक्रिया और साक्ष्यों की पारदर्शिता ही तय करेगी कि आरोप कितने सत्य हैं और किस तरह की कार्रवाई की जानी चाहिए।
