कविता ने अपने पत्र में तर्क दिया कि यह कदम आजाद हिंद की उस अंतरिम सरकार की विरासत का सम्मान करेगा जिसने 1943 में इन द्वीपों को ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता से मुक्त कराया था। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र भारत का पहला क्षेत्र था जिसे स्वतंत्रता मिली थी और इस कारण इसकी राष्ट्रीय स्मृति बेहद महत्वपूर्ण है।पूर्व सांसद ने कहा कि पिछले कुछ सालों में केंद्र सरकार ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद सेना का सम्मान किया है। सरकार ने अंडमान-निकोबार के तीन द्वीपों के नाम बदल दिए हैं लेकिन अभी भी पूरे द्वीप समूह का नाम औपनिवेशक सत्ता के दौरान रखा गया है। उन्होंने कहा कि नाम परिवर्तन के लिए संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रिया तुरंत शुरू की जानी चाहिए।
एनडीटीवी से बातचीत में कविता ने कहा कि नेताजी ने अपनी कूटनीति और बलपूर्वक कार्रवाई से अंडमान और निकोबार द्वीपों को अंग्रेजों से मुक्त कराया था। उन्होंने इसे आजाद हिंद का नाम दिया और 1947 से पहले राष्ट्रीय ध्वज फहराया था। कविता ने बताया कि यह एक राष्ट्रीय स्मृति है जिसे सम्मानित किया जाना चाहिए था लेकिन अब तक ऐसा नहीं हुआ।कविता ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री को पत्र इसलिए लिखा गया क्योंकि अंडमान और निकोबार का नाम अंग्रेजों ने रखा था और इसे बदलकर आजाद हिंद रखना एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कदम होगा। उन्होंने कहा कि नेताजी का व्यक्तित्व और उनकी ऊर्जा ऐसे बदलाव के लिए प्रेरक हैं।
केंद्र सरकार ने इससे पहले नेताजी सुभाष चंद्र बोस की स्मृति में तीन द्वीपों का नाम बदल दिया था। रॉस द्वीप अब नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वीप, नील द्वीप अब शहीद द्वीप और हेवलॉक द्वीप अब स्वराज द्वीप के नाम से जाना जाता है। यह परिवर्तन पोर्ट ब्लेयर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के तिरंगा फहराने की 75वीं वर्षगांठ को याद करते हुए किया गया था।अब यह प्रस्ताव आने वाले समय में अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के पूरे नाम परिवर्तन की दिशा में एक नया अध्याय साबित हो सकता है।
