नई दिल्ली: राज्यसभा में मोबाइल डेटा प्लान्स को लेकर एक अहम बहस देखने को मिली जब Raghav Chadha ने देश में करोड़ों मोबाइल उपभोक्ताओं के अधिकारों से जुड़े मुद्दे को उठाया उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान व्यवस्था में टेलीकॉम कंपनियां उपभोक्ताओं से पूरे डेटा का पैसा लेती हैं लेकिन उपयोग न होने वाले डेटा को समाप्त कर देती हैं जिससे ग्राहकों को आर्थिक नुकसान होता है
सांसद ने कहा कि जब कोई यूजर अपने मोबाइल प्लान के लिए भुगतान करता है तो उसे पूरे डेटा का उपयोग करने का अधिकार होना चाहिए लेकिन मौजूदा सिस्टम में डेटा को प्रतिदिन एक निश्चित सीमा में बांट दिया जाता है जैसे 1.5 जीबी या 2 जीबी और यदि उपयोग नहीं किया गया तो वह डेटा रात 12 बजे खत्म हो जाता है यह व्यवस्था उपभोक्ता के साथ अन्याय है
उन्होंने इस स्थिति को समझाने के लिए एक उदाहरण दिया जिसमें पेट्रोल की तुलना मोबाइल डेटा से की गई उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति 20 लीटर पेट्रोल खरीदता है और केवल 15 लीटर ही उपयोग करता है तो क्या बचा हुआ पेट्रोल पंप वाला वापस ले लेगा नहीं इसी तरह मोबाइल डेटा भी उपभोक्ता का अधिकार होना चाहिए
राघव चड्ढा ने आगे कहा कि टेलीकॉम कंपनियां जानबूझकर ऐसे प्लान को बढ़ावा देती हैं जिनमें दैनिक डेटा लिमिट होती है जबकि मासिक डेटा प्लान कम उपलब्ध कराए जाते हैं क्योंकि मासिक प्लान में उपभोक्ता अपनी जरूरत के अनुसार डेटा का उपयोग कर सकता है जिससे कंपनियों का लाभ कम होता है
उन्होंने इंटरनेट को आज के समय में डिजिटल ऑक्सीजन’ बताते हुए कहा कि यह केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि शिक्षा कामकाज बैंकिंग और संचार जैसे सभी क्षेत्रों में आवश्यक हो चुका है ऐसे में डेटा का यूं ही समाप्त हो जाना गंभीर चिंता का विषय है
इस समस्या के समाधान के लिए उन्होंने तीन प्रमुख सुझाव दिए पहला यह कि डेटा कैरी फॉरवर्ड की सुविधा दी जाए ताकि बचा हुआ डेटा अगले दिन में जुड़ सके दूसरा यह कि महीने के अंत में बचे हुए डेटा की वैल्यू को अगले रिचार्ज में समायोजित किया जाए जिससे उपभोक्ता को आर्थिक लाभ मिल सके और तीसरा यह कि अनयूज्ड डेटा को एक डिजिटल एसेट के रूप में माना जाए जिसे जरूरत पड़ने पर किसी अन्य व्यक्ति को ट्रांसफर किया जा सके
उन्होंने सरकार से अपील की कि वह इस दिशा में ठोस नीतिगत कदम उठाए ताकि डिजिटल युग में उपभोक्ताओं को उनका पूरा अधिकार मिल सके उनका कहना था कि यह मुद्दा केवल डेटा का नहीं बल्कि उपभोक्ता अधिकार और डिजिटल न्याय से जुड़ा हुआ है
यह मामला अब एक व्यापक बहस का विषय बन गया है जहां एक ओर उपभोक्ताओं के हितों की बात हो रही है वहीं दूसरी ओर टेलीकॉम इंडस्ट्री के व्यापार मॉडल पर भी सवाल उठ रहे हैं आने वाले समय में इस पर नीतिगत निर्णय इस पूरे सिस्टम को बदल सकते हैं
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