नई दिल्ली। भारत सरकार द्वारा जारी किए गए एक गोपनीय निर्देश ने स्मार्टफोन उद्योग की दो सबसे बड़ी दिग्गज कंपनियों, Apple (iOS) और Google (Android) को एक बड़ी चुनौती दे दी है। यह निर्देश स्मार्टफोन निर्माताओं और आयातकों को संचार साथी ऐप को हर डिवाइस में अनिवार्य रूप से प्री-इंस्टॉल करने और इसे डिलीट या डिसेबल करने की सुविधा न देने का आदेश देता है। एक रिपोर्ट के अनुसार, दोनों ही दिग्गज टेक कंपनियाँ भारत सरकार के इस कदम का पुरजोर विरोध करने की तैयारी में हैं जिसका मुख्य कारण निजता और सिस्टम सिक्योरिटी से जुड़ी गंभीर चिंताएँ हैं।
कंपनियों को आपत्ति क्यों?
पिछले सप्ताह डिपार्टमेंट ऑफ टेलिकम्युनिकेशंस स्मार्टफोन कंपनियों, मैन्युफैक्चरर और इम्पोर्टर्स को यह गोपनीय निर्देश जारी किया था। कंपनियों के नज़रिए की जानकारी रखने वाले सूत्रों ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि यह आदेश स्मार्टफोन निर्माताओं के लिए एक अभूतपूर्व चुनौती है। सरकारी ऐप्स को प्रीलोड करने का कोई इतिहास नहीं: फोन निर्माता कंपनियों का दुनिया भर में सरकारी स्वामित्व वाले ऐप्स को अपने डिवाइस में प्रीलोड करने का कोई उदाहरण या इतिहास नहीं है। यह एक बड़ा नीतिगत और तकनीकी विचलन है। बड़ी ऑपरेशनल चुनौतियां: इस निर्देश को लागू करने से कंपनियों के सामने बड़ी ऑपरेशनल चुनौतियां खड़ी हो जाएंगी। उन्हें अपने वैश्विक ऑपरेटिंग सिस्टम iOS और Android को खास तौर पर भारत के बाजार के लिए कस्टमाइज करना पड़ सकता है जो उनके वैश्विक मॉडल के विपरीत है। कम हस्तक्षेप वाले तरीके की तलाश: Apple और Google दोनों ही इस सरकारी ऐप को ग्राहकों तक पहुंचाने के लिए कम हस्तक्षेप वाले तरीकों की तलाश कर रहे हैं ताकि वे अनिवार्य प्री-इंस्टॉलेशन से बच सकें। सैमसंग की स्थिति: दिग्गज स्मार्टफोन निर्माता कंपनी सैमसंग भी इस सरकारी आदेश की समीक्षा कर रही है और अनुपालन के लिए अन्य विकल्पों पर विचार कर रही है, हालांकि अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।
प्राइवेसी और फंक्शनल क्रीपिंग पर चिंता
भारत दुनिया के सबसे बड़े मोबाइल फोन बाजारों में से एक है जहाँ 1.2 अरब मोबाइल फोन यूजर्स हैं, जिनमें से 65 करोड़ से अधिक स्मार्टफोन का उपयोग करते हैं। ऐसे बड़े उपयोगकर्ता आधार के बीच सिविल सोसाइटी के कार्यकर्ताओं ने इस ऐप को अनिवार्य रूप से प्रीलोड करने के संभावित निजता प्रभावों को लेकर गहरी चिंताएँ व्यक्त की हैं। चॉइस और सहमति का सिद्धांत कमजोर: कार्यकर्ताओं का तर्क है कि किसी सरकारी ऐप को डिवाइस में जबरन प्रीलोड करना लोगों की अपनी पसंद चॉइस और सहमति के सिद्धांतों को कमजोर करता है क्योंकि उपयोगकर्ता को इसे स्थापित करने या न करने का विकल्प नहीं दिया जाता है। फंक्शनल क्रीपिंग का खतरा: एक और गंभीर चिंता फंक्शनल क्रीपिंग की संभावना है। इसका अर्थ है कि कोई सिस्टम धीरे-धीरे अपने मूल घोषित उद्देश्य यहाँ साइबर सिक्यॉरिटी से आगे बढ़कर अन्य कार्यों में इस्तेमाल होना शुरू कर दे खासकर उपयोगकर्ता की निगरानी या ट्रैकिंग के लिए।
सरकार का तर्क: साइबर सुरक्षा और धोखाधड़ी नियंत्रण
डिपार्टमेंट ऑफ टेलिकम्युनिकेशंस DoT के अनुसार संचार साथी एक सरकारी साइबर सिक्यॉरिटी ऐप है और इसे अनिवार्य करने के पीछे स्पष्ट उद्देश्य हैं: धोखाधड़ी पर नियंत्रण: यह ऐप उपयोगकर्ताओं को फ्रॉड इन-कमिंग कॉल, मैसेज और चोरी हुए या गुम हुए मोबाइल नंबर को आसानी से रिपोर्ट करने की सुविधा प्रदान करता है। डिवाइस की प्रामाणिकता: उपभोक्ता अपने IMEI नंबर का उपयोग करके यह जान सकते हैं कि उनका डिवाइस असली है या नकली । राष्ट्रीय सुरक्षा: सरकार का कहना है कि डुप्लीकेट या स्पूफ किए गए IMEI वाले मोबाइल हैंडसेट्स टेलीकॉम साइबर सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा करते हैं, और यह ऐप इस खतरे को नियंत्रित करने में सहायक होगा।
वैश्विक संदर्भ
हालाँकि, अधिकांश पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों में सरकार द्वारा किसी ऐप को अनिवार्य रूप से प्री-इंस्टॉल करवाना एक असामान्य कदम माना जाता है, लेकिन यह पूरी तरह से अनूठा नहीं है। हाल ही में रूस ने भी स्मार्टफोन कंपनियों को सरकार समर्थित मैसेजिंग प्लेटफॉर्म MAX को प्रीइंस्टॉल करने का निर्देश दिया था, जिसके आलोचकों ने चिंता जताई थी कि इसका इस्तेमाल यूजर्स को ट्रैक करने के लिए किया जा सकता है। फिलहाल, Apple, Samsung और Google तीनों ने ही इस गोपनीय सरकारी निर्देश पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है लेकिन अंदरूनी सूत्रों के अनुसार वे अपने वैश्विक सुरक्षा और निजता मानकों के साथ समझौता किए बिना, इसका विरोध करने और समाधान खोजने की दिशा में काम कर रहे हैं।
