सोमनाथ का ऐतिहासिक महत्व
सोमनाथ मंदिर को भगवान शिव का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। शास्त्रों में इसे सबसे पहले स्थान पर रखा गया है, सौराष्ट्रे सोमनाथं च इस मंदिर का निर्माण चंद्रदेव ने स्वयं सोने से किया था फिर सूर्यदेव ने चांदी से और बाद में भगवान श्रीकृष्ण ने लकड़ी से इसे सुंदर रूप दिया। सोलंकी राजपूत शासकों ने इस मंदिर को पत्थर से भव्य रूप प्रदान किया जो इसे आज के रूप में देख सकते हैं। सोमनाथ मंदिर की किवदंती चंद्रदेव के साथ जुड़ी हुई है जो भगवान शिव की तपस्या करने के लिए यहां आए थे। यही कारण है कि यह मंदिर चंद्र से जुड़ा एकमात्र शिव तीर्थ माना जाता है।
महमूद गजनवी द्वारा हमले
सोमनाथ मंदिर की सबसे दुखद घटना 1025 ईस्वी की है, जब महमूद गजनवी ने इस मंदिर पर हमला किया और इसे लूटकर नष्ट कर दिया। गजनवी ने मंदिर के चंदन द्वार को लूटकर अफगानिस्तान के गजनी में मस्जिद में स्थापित कर दिया था। कई बार लूटने और तोड़ने के बावजूद मंदिर का आंतरिक गर्भगृह हमेशा शांति से बना रहा। स्वतंत्रता के बाद 1951 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने सोमनाथ का दौरा किया और गजनवी द्वारा लूटे गए चंदन द्वार को वापस लाकर मंदिर में स्थापित किया।
मंदिर की अद्भुत वास्तुकला
सोमनाथ मंदिर को चालुक्य शैली में बनाया गया है, और इसका शिखर 155 फीट ऊंचा है। मंदिर में सोने का कलश और विशाल मंडपम हैं जो इसे और भी भव्य बनाते हैं। बाणस्तंभ जो एक दिशासूचक स्तंभ है इसे मंदिर परिसर में देखा जा सकता है। इस स्तंभ पर समुद्र की दिशा में बने तीर का निशान भी स्पष्ट रूप से दिखता है। इस पर संस्कृत में लिखा है, आसमुद्रांत दक्षिण ध्रुव पर्यंत, अबाधित ज्योर्तिमार्ग यानी यहां से दक्षिण ध्रुव तक कोई भूमि नहीं है।
समुद्र और शिव की कृपा
सोमनाथ मंदिर अरब सागर के किनारे स्थित है, लेकिन एक अद्भुत बात यह है कि समुद्र की लहरें कभी भी मंदिर के गर्भगृह तक नहीं पहुंच पाई हैं। स्थानीय पंडितों के अनुसार यह भगवान शिव की कृपा का प्रतीक है। माना जाता है कि समुद्र महादेव की मर्यादा को कभी नहीं लांघता जिससे मंदिर सुरक्षित रहता है।
