नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों में अवैध खनन को लेकर बुधवार को सुनवाई के दौरान कड़ा रुख अपनाया और कहा कि रोक के बावजूद भी अवैध खनन जारी है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की बेंच ने स्पष्ट किया कि अगर खनन को रोका नहीं गया तो ऐसे हालात बन सकते हैं जिन्हें सुधार पाना संभव नहीं होगा। कोर्ट ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए खनन को रोकने और अरावली की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विशेषज्ञों की एक एक्सपर्ट कमेटी गठित करने का निर्देश दिया।
बेंच ने राजस्थान सरकार से यह गारंटी भी ली कि अरावली क्षेत्र में किसी भी प्रकार का खनन नहीं होने दिया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहले जारी अंतरिम आदेश वैसा ही बना रहेगा और नए रिट याचिकाओं को दाखिल न करने की भी सलाह दी। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने यह भी कहा कि उन्हें यह पता है कि नई याचिकाएं क्यों दायर की जा रही हैं। सुनवाई में हस्तक्षेप याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अरावली की परिभाषा को लेकर कहा कि इसके पीछे विज्ञान होना चाहिए और इसके लिए अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों की जरूरत है।
बेंच ने कहा कि सभी पक्ष अपने-अपने नाम सुझाएं और चरणबद्ध तरीके से एक्सपर्ट टीम बनाई जाएगी।
सुनवाई के दौरान एक अन्य वकील ने कोर्ट के सुओ मोतो आदेश का स्वागत करते हुए कहा कि उन्होंने किसानों के साथ जमीनी स्तर पर काम किया है और जियो-टैगिंग भी की है। चीफ जस्टिस ने कहा कि 29 दिसंबर 2025 के आदेश के संदर्भ में कोर्ट के सामने एक व्यापक नोट और अहम सवाल रखे जाएंगे, ताकि सही और संतुलित फैसला लिया जा सके।
राजस्थान सरकार की ओर से के.एम. नटराजन ने अदालत को आश्वासन दिया कि राज्य सरकार तुरंत यह सुनिश्चित करेगी कि प्रदेश में कोई अवैध खनन नहीं हो। इसके साथ ही कपिल सिब्बल की ओर से दायर अंतरिम आवेदन को भी मंजूर कर लिया गया।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर को 100 मीटर से छोटी पहाड़ियों पर खनन की अनुमति देने वाला आदेश दिया था, जिससे देशभर में विवाद उत्पन्न हो गया था।
29 नवंबर को उसी आदेश पर रोक लगा दी गई और मामले की जांच के लिए एक्सपर्ट कमेटी गठित करने के निर्देश दिए गए थे। केंद्र और अरावली के चार राज्यों (राजस्थान, गुजरात, दिल्ली और हरियाणा) को नोटिस जारी कर जवाब भी मांगा गया था।
सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा कि यह कोई प्रतिद्वंद्वी मुकदमा नहीं है, बल्कि अरावली पर्वतमाला का संरक्षण ही उद्देश्य है। 29 दिसंबर 2025 के आदेश में जिन बिंदुओं को रेखांकित किया गया था, उन्हें ध्यान में रखते हुए अरावली की परिभाषा से जुड़े वैज्ञानिक, पर्यावरणीय, भूवैज्ञानिक और विधिक पहलुओं की पुनः समीक्षा के लिए स्वतंत्र विशेषज्ञ निकाय की आवश्यकता हो सकती है।