दादी को सुबह भेजा था विशेष संदेश शांभवी की दादी मीरा पाठक ने रूंधे गले से बताया कि उनकी पोती उन्हें प्यार से दद्दाबुलाती थी। बुधवार की सुबह शांभवी ने मोबाइल पर गुड मॉर्निंग दद्दाका मैसेज भेजा। मीरा जी कहती हैं शांभवी अक्सर नियमित मैसेज नहीं करती थी उस सुबह उसका मैसेज देखकर मुझे थोड़ी हैरानी भी हुई लेकिन क्या पता था कि वह आखिरी बार याद कर रही है। शांभवी के पिता विक्रम पाठक भारतीय वायुसेना में पायलट रहे हैं और उन्हीं से प्रेरणा लेकर शांभवी ने भी आसमान छूने की ठानी थी।
न्यूजीलैंड से ली थी ट्रेनिंग दुनिया के कई देशों में भरी उड़ान शांभवी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा ग्वालियर के एयरफोर्स विद्या भारती स्कूल और दिल्ली के बाल भारती स्कूल से पूरी की। उनके सपनों को पंख तब मिले जब उन्होंने न्यूजीलैंड से कमर्शियल पायलट की प्रोफेशनल ट्रेनिंग ली। वह एक अनुभवी पायलट के रूप में उभर रही थीं और ब्रिटेन व रूस जैसे देशों के लिए अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का संचालन भी कर चुकी थीं। उनके घर का नाम चीनीथा और वह पूरे परिवार की लाडली थीं।
चुलबुला स्वभाव और ग्वालियर से गहरा लगाव पड़ोसियों और दादी ने बताया कि शांभवी स्वभाव से बेहद चुलबुली और होशियार थीं। पड़ोस की ऊषा उनियाल ने याद करते हुए कहा कि शांभवी जब भी ग्वालियर आती थी, अपनी दादी और पड़ोसियों से मिलना कभी नहीं भूलती थी। आखिरी बार वह अक्टूबर 2025 में अपने दादाजी की बरसी पर ग्वालियर आई थीं। उनके पिता विक्रम पाठक सेवानिवृत्ति के बाद अब परिवार के साथ दिल्ली की लोधी कॉलोनी में रहते हैं।
एक होनहार करियर का दुखद अंत महज 25 साल की उम्र में शांभवी ने वह मुकाम हासिल कर लिया था जिसका सपना लाखों युवा देखते हैं। लेकिन बारामती एयरपोर्ट पर लैंडिंग के दौरान विमान हादसे ने एक बहादुर पायलट और एक परिवार की हंसती-खेलती बेटी को सदा के लिए खामोश कर दिया।
