स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, निमेसुलाइड एक नॉन-स्टेरॉइडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग (NSAID) है, जो दर्द और सूजन कम करने में असरदार है, लेकिन इसकी ज्यादा मात्रा से लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है। विशेषज्ञों की रिपोर्ट और फार्माकोविजिलेंस डाटा के आधार पर यह फैसला लिया गया है, क्योंकि बाजार में इसके कई सुरक्षित विकल्प मौजूद हैं।
सरकारी आदेश के बाद निमेसुलाइड के हाई डोज ब्रांड बेचने वाली दवा कंपनियों को तुरंत प्रोडक्शन बंद करना होगा। साथ ही, बाजार में पहले से मौजूद 100 mg से ज्यादा डोज वाली दवाओं को रिकॉल करना अनिवार्य होगा।
इस फैसले का असर आम मरीजों पर भी पड़ेगा। कुछ बड़ी फार्मा कंपनियों की दर्द निवारक दवाएं मेडिकल स्टोर्स से हट सकती हैं। अब मरीजों को बिना डॉक्टर की सलाह के निमेसुलाइड लेना मुश्किल होगा और चिकित्सक जरूरत के अनुसार पैरासिटामोल, आइबुप्रोफेन या अन्य विकल्प लिखेंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि हाई डोज दर्द निवारक दवाओं का लंबे समय तक सेवन लिवर के लिए खतरनाक हो सकता है।
बच्चों के मामले में यह फैसला ज्यादा प्रभावी नहीं होगा, क्योंकि निमेसुलाइड बच्चों के लिए पहले से ही प्रतिबंधित है। वहीं, जानवरों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली सभी तरह की निमेसुलाइड दवाओं पर सरकार फरवरी 2025 में ही पूरी तरह रोक लगा चुकी है।
इसी बीच दवाओं की गुणवत्ता को लेकर भी चिंता बढ़ी है। पैरासिटामोल सहित 53 दवाएं क्वालिटी टेस्ट में फेल पाई गई हैं। इनमें विटामिन, शुगर, ब्लड प्रेशर और एंटीबायोटिक दवाएं शामिल हैं। देश की शीर्ष ड्रग रेगुलेटरी संस्था सीडीएससीओ (CDSCO) ने इन दवाओं की सूची जारी कर संबंधित कंपनियों से जवाब तलब किया है।
सरकार का कहना है कि इन कदमों का मकसद मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और दवाओं के दुरुपयोग पर सख्ती से रोक लगाना है।
