बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार नौ जजों की पीठ धार्मिक अधिकारों और स्वतंत्रता से जुड़े सात महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्नों की जांच करेगी। इन सवालों के आधार पर यह तय किया जाएगा कि क्या सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी जानी चाहिए या परंपरागत प्रतिबंध को बरकरार रखा जाए।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने सोमवार को सभी पक्षों को 14 मार्च तक अपनी लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने सुनवाई की विस्तृत समय-सारिणी भी तय कर दी है। कोर्ट के अनुसार नौ न्यायाधीशों की पीठ 7 अप्रैल को सुबह 10:30 बजे से कार्यवाही शुरू करेगी। पुनर्विचार याचिकाकर्ताओं को 7 से 9 अप्रैल तक सुना जाएगा जबकि पुनर्विचार के विरोधियों को 14 से 16 अप्रैल तक अपनी दलीलें रखने का अवसर मिलेगा। 21 अप्रैल को प्रतिवाद सुना जाएगा और 22 अप्रैल तक एमिकस क्यूरी द्वारा अंतिम और समापन दलीलें पेश की जाएंगी।
गौरतलब है कि सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से सबरीमाला में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी। उस फैसले में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन एएम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ बहुमत में थे जबकि पीठ की एकमात्र महिला न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा ने असहमति जताई थी। उन्होंने अपने मत में कहा था कि धार्मिक परंपराओं में न्यायिक हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए।
2018 के फैसले के बाद केरल में व्यापक विरोध-प्रदर्शन हुए थे और दर्जनों पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गई थीं। नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए मामले को बड़ी पीठ के समक्ष विचारार्थ रखने का निर्णय लिया था लेकिन अंतिम निर्णय नहीं दिया गया था।
अब नौ जजों की संविधान पीठ इस जटिल संवैधानिक विवाद पर व्यापक सुनवाई कर कानूनी प्रश्नों का निर्धारण करेगी। देशभर की निगाहें इस सुनवाई पर टिकी हैं क्योंकि इसका असर न केवल सबरीमाला मंदिर की परंपराओं पर पड़ेगा बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता और लैंगिक समानता से जुड़े अन्य मामलों पर भी दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।
