यह एक दशक से अधिक समय में पहला ऐसा मामला होगा, जिसकी अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में पूरी सुनवाई होगी।
म्यांमार सरकार ने नरसंहार के सभी आरोपों से इनकार किया है। संयुक्त राष्ट्र की म्यांमार के लिए स्वतंत्र जांच तंत्र के प्रमुख निकोलस कूंजियन ने रॉयटर्स से कहा- यह मामला तय करेगा कि नरसंहार की परिभाषा क्या है, उसे साबित करने के मानक क्या होंगे और उल्लंघनों के निवारण कैसे किए जाएंगे। ये सब भविष्य के मामलों के लिए अहम मिसाल बनेंगे।
यह केस 2019 में द गैंबिया ने दायर किया था, जिसमें आरोप लगाया गया है कि म्यांमार ने 1948 के जेनोसाइड कन्वेंशन (नरसंहार रोकथाम और दंड संधि) का उल्लंघन करते हुए रोहिंग्या मुस्लिमों के खिलाफ नरसंहार किया है। यह पिछले एक दशक से अधिक समय में ICJ में नरसंहार के किसी मामले की पहली पूरी मेरिट्स सुनवाई है।
2017 की सैन्य कार्रवाई और पलायन
2017 में म्यांमार की सेना द्वारा चलाए गए अभियान के बाद कम से कम 7.30 लाख रोहिंग्या अपने घर छोड़कर पड़ोसी बांग्लादेश चले गए थे। शरणार्थियों ने हत्या, सामूहिक बलात्कार और गांवों को जलाने जैसे आरोप लगाए। संयुक्त राष्ट्र की एक तथ्य-जांच मिशन ने निष्कर्ष निकाला था कि उस सैन्य अभियान में नरसंहारात्मक कृत्य शामिल थे। हालांकि, म्यांमार के अधिकारियों ने इस रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा कि सेना का अभियान मुस्लिम उग्रवादियों के हमलों के जवाब में एक वैध आतंकवाद-रोधी कार्रवाई था।
सू की का बचाव, अब बंद कमरे में सुनवाई
2019 की प्रारंभिक सुनवाई के दौरान म्यांमार की तत्कालीन नेता आंग सान सू की ने गाम्बिया के आरोपों को अधूरे और भ्रामक करार दिया था। मौजूदा सुनवाई का एक अहम पहलू यह है कि पहली बार कथित अत्याचारों को लेकर रोहिंग्या पीड़ितों की बातें किसी अंतरराष्ट्रीय अदालत में सुनी जाएंगी। संवेदनशीलता और निजता के कारण ये सत्र बंद कमरे में होंगे और मीडिया के लिए खुले नहीं होंगे। आईसीजे में सुनवाई सोमवार सुबह 10 बजे (0900 GMT) से शुरू होकर तीन सप्ताह तक चलेगी।
पहले सप्ताह गैंबिया और उसके समर्थक अपनी दलीलें पेश करेंगे।
हालांकि, ICJ के फैसले बाध्यकारी होते हैं, लेकिन लागू करने की कोई सीधी ताकत नहीं। म्यांमार की मौजूदा जंटा सरकार पहले ही अंतरिम आदेशों की अनदेखी कर चुकी है।
म्यांमार का मौजूदा संकट
गौरतलब है कि 2021 में म्यांमार की सेना ने निर्वाचित असैन्य सरकार को सत्ता से हटा दिया था। इसके बाद लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनों को बलपूर्वक दबाया गया, जिससे देशव्यापी सशस्त्र विद्रोह भड़क उठा। इस बीच, म्यांमार में चरणबद्ध चुनाव कराए जा रहे हैं, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र, कई पश्चिमी देशों और मानवाधिकार संगठनों ने न निःशुल्क और न निष्पक्ष बताया है।
