लखनऊ। उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) की राजनीति में इन दिनों जायके और जाति का एक अनोखा मेल देखने को मिल रहा है। नए साल के पहले दिन समाजवादी पार्टी (सपा) (Samajwadi Party – SP) के मुख्यालय में आयोजित ‘बाटी-चोखा’ की दावत ने राज्य में एक नई राजनीतिक चर्चा को जन्म दे दिया है। यह दावत सीधे तौर पर भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) के भीतर चल रहे ‘ब्राह्मण बनाम संगठन’ विवाद पर कटाक्ष के रूप में देखी जा रही है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, नए साल के अवसर पर आयोजित इस भोज में शामिल कार्यकर्ताओं और जनता को संबोधित करते हुए अखिलेश यादव ने भाजपा पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा, “बाटी-चोखा हमारे प्रदेश की संस्कृति का हिस्सा है, इसे आपसी झगड़ों और राजनीति में बदनाम नहीं किया जाना चाहिए। सभी को बिना किसी पाबंदी के एक साथ बैठकर भोजन करना चाहिए।”
सपा प्रमुख का यह बयान भाजपा के उन ब्राह्मण विधायकों और विधान पार्षदों (MLCs) के समर्थन में माना जा रहा है, जिन्हें हाल ही में एक ऐसी ही दावत में शामिल होने के लिए अपनी ही पार्टी से चेतावनी मिली थी। सपा सूत्रों के अनुसार, इस भोज का मकसद सत्तारूढ़ दल को यह संदेश देना था कि खाने-पीने और सामाजिक मेलजोल पर किसी भी तरह की जातिगत बंदिश गलत है।
क्या है पूरा विवाद?
इस सियासी दावत की पटकथा लगभग एक सप्ताह पहले लिखी गई थी। उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने पार्टी के कई ब्राह्मण विधायकों और एमएलसी को चेतावनी जारी की थी। ये नेता पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोकप्रिय व्यंजन ‘बाटी-चोखा’ के बहाने आयोजित एक सामुदायिक बैठक और डिनर में शामिल हुए थे। भाजपा ने इसे जाति आधारित गतिविधि और अनुशासनहीनता के तौर पर देखा था। हालांकि, पूर्व सांसद ब्रजभूषण शरण सिंह जैसे नेताओं ने अपनी ही पार्टी के इस रुख का विरोध करते हुए कहा था कि जब दल खुद जाति सम्मेलन करते हैं, तो विधायकों के साथ बैठने पर आपत्ति क्यों है।
जानकारों का मानना है कि अखिलेश यादव ने ‘बाटी-चोखा’ के जरिए दो निशाने साधे हैं। भाजपा के भीतर जो ब्राह्मण नेता संगठन की सख्ती से नाराज हैं, उनके प्रति सहानुभूति दिखाकर सपा उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रही है। वहीं, बाटी-चोखा पूर्वी यूपी की पहचान है। इसके जरिए सपा खुद को आम जनता की परंपराओं के करीब और भाजपा को कठोर दिखाने की कोशिश कर रही है।
