विश्लेषकों का मानना है कि जमात-ए-इस्लामी का यह कदम वास्तविक समावेशिता से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय समुदाय और अल्पसंख्यकों को गुमराह करने की रणनीति है। पार्टी के संविधान में निहित प्रावधान यह साफ करते हैं कि कोई भी हिंदू या गैर-मुस्लिम कभी भी जमात-ए-इस्लामी का पूर्ण सदस्य नहीं बन सकता। ऐसे में सवाल उठता है कि जब किसी समुदाय को संगठन के भीतर बराबरी का अधिकार ही नहीं दिया जा सकता, तो उसे चुनावी उम्मीदवार बनाना कितना ईमानदार कदम कहा जा सकता है।
संविधान की सख्त शर्तें, गैर-मुस्लिमों को बराबरी नहीं
एक रिपोर्ट के मुताबिक, जमात-ए-इस्लामी के संविधान की धारा 11 स्पष्ट रूप से कहती है कि कोई भी गैर-मुस्लिम केवल “एसोसिएट सदस्य” ही बन सकता है। इसका मतलब यह है कि हिंदू या अन्य गैर-मुस्लिम नेताओं को पार्टी की कोर कमिटी, नीति-निर्माण या अहम फैसलों में कोई भूमिका नहीं मिलेगी। पूर्ण सदस्यता केवल मुसलमानों के लिए आरक्षित है। ऐसे में कृष्ण नंदी जैसे नेताओं को उम्मीदवार बनाना प्रतीकात्मक कदम से ज्यादा कुछ नहीं लगता।
यही नहीं, पार्टी के संविधान की धारा 7 और 9 में पूर्ण सदस्य बनने के लिए जिन शर्तों का उल्लेख है, वे किसी भी स्वाभिमानी हिंदू या गैर-मुस्लिम के लिए स्वीकार्य नहीं मानी जा सकतीं। इन धाराओं के तहत पार्टी सदस्य को अल्लाह, पैगंबर मोहम्मद और कुरान को एकमात्र आदर्श मानना अनिवार्य है। साथ ही, सदस्य को शरिया कानून के अनुसार जीवन जीने और इस्लामी कर्तव्यों का पालन करने की शपथ लेनी होती है। इसके अलावा, “इस्लाम से भटके हुए लोगों” से दूरी बनाए रखने की शर्त भी संविधान में दर्ज है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, जमात-ए-इस्लामी ने वर्ष 2008 में अपने संविधान में कुछ सीमित बदलाव किए थे, लेकिन ये बदलाव भी कथित तौर पर चुनाव आयोग और जनप्रतिनिधित्व आदेश के नियमों से बचने के लिए किए गए थे, ताकि पार्टी का पंजीकरण रद्द न हो। मूल विचारधारा और कट्टर इस्लामी सोच में कोई ठोस बदलाव नहीं किया गया। इसलिए विशेषज्ञों का कहना है कि बिना बुनियादी सुधार के समावेशिता की बात करना महज राजनीतिक अवसरवाद है।
चुनाव का माहौल और बदली हुई सियासी तस्वीर
बांग्लादेश में 12 फरवरी को संसदीय चुनाव होने हैं। अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के तख्तापलट के बाद यह देश का पहला आम चुनाव है। अब तक बांग्लादेश की राजनीति मुख्य रूप से अवामी लीग और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के इर्द-गिर्द घूमती रही है, लेकिन इस बार हालात बिल्कुल अलग हैं। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिससे वह चुनाव नहीं लड़ पा रही है।
इस राजनीतिक खालीपन का फायदा उठाकर जमात-ए-इस्लामी खुद को एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है। विश्लेषकों का मानना है कि हिंदू उम्मीदवार उतारना इसी रणनीति का हिस्सा है, ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पार्टी पर लगने वाले कट्टरपंथी और अल्पसंख्यक विरोधी छवि के आरोपों को कमजोर किया जा सके।
महिलाओं को लेकर भी कट्टर रुख
जमात-ए-इस्लामी की कथित समावेशिता की पोल महिलाओं के मुद्दे पर भी खुलती है। पार्टी ने इस चुनाव में एक भी महिला उम्मीदवार नहीं उतारा है। पार्टी प्रमुख शफीकुर रहमान का साफ कहना है कि जमात-ए-इस्लामी की कभी कोई महिला प्रमुख नहीं बन सकती। उनके अनुसार, “अल्लाह ने पुरुष और महिलाओं को अलग-अलग बनाया है” और महिलाएं पार्टी का नेतृत्व नहीं कर सकतीं।
शफीकुर रहमान का एक और बयान काफी विवादित रहा, जिसमें उन्होंने कामकाजी महिलाओं की तुलना वेश्यावृत्ति से कर दी। इस बयान के बाद ढाका समेत कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन हुए और जमात-ए-इस्लामी की सोच पर गंभीर सवाल खड़े हो गए। उल्लेखनीय है कि बांग्लादेश में जहां एक ओर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं हैं, वहीं जमात-ए-इस्लामी का ‘हिंदू उम्मीदवार’ उतारना वास्तविक बदलाव से ज्यादा राजनीतिक दिखावा प्रतीत होता है। पार्टी का संविधान, उसकी विचारधारा और नेताओं के बयान यह संकेत देते हैं कि बिना ठोस वैचारिक और संरचनात्मक सुधार के यह समावेशिता केवल एक चुनावी रणनीति है, जिसका उद्देश्य सत्ता की दौड़ में अपनी छवि को चमकाना भर है।
