तेहरान। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच यह सवाल फिर चर्चा में है कि जब के पास परमाणु हथियार होने की बात कही जाती है, तो को इन्हें हासिल करने से क्यों रोका जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसका कारण अंतरराष्ट्रीय कानून की संरचना और देशों की संधियों में भागीदारी से जुड़ा है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय कानून में परमाणु हथियार रखने पर पूरी तरह प्रतिबंध नहीं है। केवल वे देश ही बाध्य होते हैं, जिन्होंने संबंधित संधियों को स्वीकार किया है। इसी संदर्भ में Nuclear Non-Proliferation Treaty यानी एनपीटी को अहम माना जाता है, जिसका उद्देश्य परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना और शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा को बढ़ावा देना है
इस संधि के तहत दुनिया को परमाणु हथियार संपन्न और गैर-परमाणु देशों में बांटा गया। 1 जनवरी 1967 से पहले परमाणु परीक्षण करने वाले देशों अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन—को परमाणु संपन्न माना गया, जबकि अन्य देशों ने ऐसे हथियार न बनाने की प्रतिबद्धता जताई।
ईरान 1970 से एनपीटी का सदस्य है, इसलिए वह गैर-परमाणु देश की श्रेणी में आता है और उसे परमाणु हथियार विकसित न करने की शर्तों का पालन करना होता है। साथ ही उसका परमाणु कार्यक्रम International Atomic Energy Agency की निगरानी में रहता है।
इसके विपरीत, इजरायल एनपीटी का सदस्य नहीं है। अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार, कोई भी देश उस संधि से बाध्य नहीं होता जिसका वह हिस्सा नहीं है। इसी वजह से इजरायल पर एनपीटी के नियम लागू नहीं होते।
विशेषज्ञों का कहना है कि यही कारण है कि दोनों देशों की कानूनी स्थिति अलग दिखाई देती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में परमाणु हथियारों पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। केवल वे देश ही बाध्य होते हैं, जिन्होंने एनपीटी या 2017 की परमाणु हथियार निषेध संधि जैसे समझौतों को स्वीकार किया है। इस तरह ईरान और इजरायल के बीच अंतर किसी दोहरे मापदंड से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय कानून की सहमति-आधारित व्यवस्था को दर्शाता है।
