नई दिल्ली। भारत–रूस की दोस्ती समय की कसौटी पर कई बार खरी उतरी है। जब-जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत पर दबाव बढ़ा, तब-तब रूस भारत के साथ मजबूती से खड़ा नजर आया। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस द्वारा भारत के पक्ष में इस्तेमाल किया गया वीटो इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की हालिया भारत यात्रा के बाद यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है कि आखिर रूस ने कब-कब अपने वीटो के जरिए भारत को वैश्विक दबाव से बचाया और चीन-अमेरिका की रणनीतियों पर पानी फेर दिया।
कश्मीर मुद्दे पर 1957 में रूस बना भारत की ढाल
कश्मीर को लेकर संयुक्त राष्ट्र में पहली बड़ी लड़ाई 20 फरवरी 1957 को लड़ी गई। ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका ने भारत और पाकिस्तान दोनों से कश्मीर से सेनाएं हटाने और वहां संयुक्त राष्ट्र बल की तैनाती का प्रस्ताव रखा। चीन भी इसी प्रस्ताव के समर्थन में खड़ा था। ऐसे नाजुक समय में सोवियत संघ ने अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए इस प्रस्ताव पर वीटो लगा दिया। यह भारत के लिए कूटनीतिक जीत थी, जिसने यह स्पष्ट कर दिया कि कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है और उस पर किसी बाहरी दबाव को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
1961 में गोवा की आजादी पर पश्चिमी देशों के खिलाफ रूस का समर्थन
दिसंबर 1961 में जब भारत ने गोवा, दमन और दीव को पुर्तगाल के कब्जे से मुक्त कराया, तब अमेरिका और ब्रिटेन समेत कई पश्चिमी देशों ने भारत पर सैन्य आक्रमण का आरोप लगाते हुए संयुक्त राष्ट्र में उसके खिलाफ प्रस्ताव पेश किया। भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने की इस कोशिश को सोवियत संघ ने वीटो लगाकर विफल कर दिया। उस समय संयुक्त राष्ट्र में सोवियत प्रतिनिधि वेलेरियन जोरिन ने साफ शब्दों में कहा था कि उपनिवेशवाद का समर्थन करना आधुनिक दुनिया के विचारों के खिलाफ है। यह भारत के लिए एक बड़ी रणनीतिक जीत साबित हुई।
1962 में फिर कश्मीर पर वीटो
1962 का वर्ष भारत-चीन युद्ध और कूटनीतिक दबावों से भरा रहा। इसी दौरान आयरलैंड द्वारा कश्मीर को फिर से अंतरराष्ट्रीय मंच पर लाने का प्रस्ताव रखा गया। चीन भी चाहता था कि कश्मीर का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र में गरमाया जाए। लेकिन सोवियत संघ ने एक बार फिर वीटो का इस्तेमाल कर इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया और स्पष्ट कर दिया कि कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय मुद्दा है।
1971 में निर्णायक वीटो और बांग्लादेश का गठन
1971 में भारत-पाक युद्ध और बांग्लादेश के गठन के दौरान सोवियत संघ (रूस) की भूमिका ऐतिहासिक और निर्णायक रही। पाकिस्तान के समर्थन में अमेरिका और चीन ने संयुक्त राष्ट्र में युद्धविराम और भारतीय सेनाओं की वापसी से जुड़े तीन अलग-अलग प्रस्ताव पेश किए। 4 दिसंबर 1971 को पहला प्रस्ताव लाया गया, जिस पर सोवियत संघ ने वीटो कर दिया। इसके बाद 5 दिसंबर को शरणार्थियों की वापसी के नाम पर दूसरा प्रस्ताव आया, उस पर भी रूस ने वीटो लगाया। फिर 14 दिसंबर को तीसरा प्रस्ताव पेश हुआ, लेकिन उसे भी सोवियत संघ ने रोक दिया। इन तीनों निर्णायक वीटो से भारत को सैन्य कार्रवाई के लिए आवश्यक समय मिला, जिसका परिणाम बांग्लादेश के एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आने के रूप में सामने आया।
रणनीतिक दोस्ती की मजबूत नींव
इन ऐतिहासिक फैसलों ने भारत और रूस के रिश्तों को नई ऊंचाई दी। यही वजह है कि आज जब रूस यूक्रेन संकट को लेकर पश्चिमी देशों के दबाव में है, तब भी भारत ने अपने पुराने मित्र से दूरी नहीं बनाई। पुतिन की हालिया यात्रा के दौरान दी गई यह टिप्पणी कि दोनों देश वैश्विक दबाव से ऊपर उठकर फैसले लेते हैं, इसी अटूट साझेदारी को दर्शाती है।रूस का वीटो भारत के लिए न केवल कूटनीतिक सुरक्षा कवच साबित हुआ, बल्कि यह भी साबित करता है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर सच्ची दोस्ती वही होती है, जो मुश्किल वक्त में साथ खड़ी हो।
