प्रधानमंत्री फ्रेडरिकसन का यह बयान ऐसे समय सामने आया है, जब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक सार्वजनिक टिप्पणी में ग्रीनलैंड को रणनीतिक रूप से बेहद अहम बताते हुए उस पर नियंत्रण की इच्छा जाहिर की थी। हालांकि यह बयान किसी आधिकारिक नीति का हिस्सा नहीं है लेकिन इसके बाद यूरोप और नाटो से जुड़े देशों में कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। कई देशों ने इसे सहयोगी देशों के बीच भरोसे के सिद्धांत के खिलाफ बताया है।ग्रीनलैंड भले ही जनसंख्या के लिहाज़ से छोटा इलाका हो, लेकिन इसकी भौगोलिक स्थिति इसे वैश्विक राजनीति में बेहद अहम बनाती है। यह डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र है और नाटो का हिस्सा भी है। आर्कटिक क्षेत्र में स्थित होने के कारण ग्रीनलैंड से सैन्य निगरानी, मिसाइल चेतावनी प्रणाली और समुद्री मार्गों पर नजर रखना अपेक्षाकृत आसान होता है। जलवायु परिवर्तन के चलते आर्कटिक में नए समुद्री रास्तों के खुलने की संभावना ने इसकी रणनीतिक अहमियत और बढ़ा दी है।
डेनमार्क की प्रधानमंत्री ने नाटो के मूल सिद्धांतों की याद दिलाते हुए कहा कि यह संगठन आपसी भरोसे, सामूहिक सुरक्षा और संप्रभुता के सम्मान पर आधारित है। यदि किसी सदस्य या सहयोगी देश की क्षेत्रीय अखंडता को चुनौती दी जाती है, तो इससे नाटो की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े होंगे। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसे हालात में नाटो केवल एक औपचारिक संगठन बनकर रह जाएगा, जिसकी वैश्विक भूमिका सीमित हो सकती है।इस पूरे विवाद पर ग्रीनलैंड की ओर से भी स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने आई है। ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस-फ्रेडरिक नीलसन ने कहा कि उनके देश का भविष्य किसी बाहरी दबाव या अंतरराष्ट्रीय बयानबाज़ी से तय नहीं होगा। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि ग्रीनलैंड के लोग अपने राजनीतिक और आर्थिक फैसले खुद लेने में सक्षम हैं और किसी भी तरह की अटकलों से डरने की जरूरत नहीं है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की ग्रीनलैंड में दिलचस्पी के पीछे कई रणनीतिक कारण हैं। आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियां, दुर्लभ खनिज संसाधनों की उपलब्धता और भविष्य में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए खुलने वाले नए समुद्री मार्ग इस इलाके को वैश्विक शक्तियों के लिए अहम बनाते हैं। इसके अलावा, ग्रीनलैंड में पहले से मौजूद अमेरिकी सैन्य ढांचा भी इसकी रणनीतिक उपयोगिता को बढ़ाता है।फिलहाल यह विवाद राजनीतिक बयानों और कूटनीतिक प्रतिक्रियाओं तक सीमित है, लेकिन इससे अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में बढ़ता तनाव साफ नजर आ रहा है। डेनमार्क ने स्पष्ट कर दिया है कि ग्रीनलैंड की संप्रभुता पर किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा। आने वाले समय में नाटो और उसके सहयोगी देशों के बीच इस मुद्दे पर चर्चा और तेज होने की संभावना है।
