धार्मिक महत्व के अलावा दूब घास के गुणों को आयुर्वेद में कई तरह से दर्शाया गया है। यह कफ और वात को संतुलित करने वाली औषधि मानी जाती है। यदि शरीर में वात या कफ असंतुलित हैं तो दूब घास का उचित सेवन इन दोषों को संतुलित करने में मदद करता है। लेकिन इसके सही उपयोग से पहले इसके आंतरिक और बाहरी गुणों को जानना बेहद आवश्यक है।
बाहरी उपयोग:
दूब घास में रक्त को रोकने की क्षमता होती है। चोट लग जाने पर यदि रक्त नहीं रुक रहा है या पुराने घाव में बार-बार खून आता है, तो दूब का लेप किया जा सकता है। यह घाव को भरने और संक्रमण से बचाने में भी मदद करता है। गर्मियों में नाक से खून आना या सिरदर्द जैसी समस्याओं में दूब के रस को नाक में डालना आराम देता है। इसके अलावा, मुल्तानी मिट्टी के साथ मिलाकर सूंघने से भी राहत मिलती है। यदि गर्मियों में त्वचा जलने लगती है, तो दूब का लेप त्वचा को ठंडक और आराम प्रदान करता है।
आंतरिक उपयोग:
ध्यान देने योग्य बात यह है कि दूब घास का अधिक सेवन या गलत तरीके से इस्तेमाल करने से प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ सकते हैं। इसलिए बाहरी या आंतरिक उपयोग में आयुर्वेदिक और चिकित्सकीय मार्गदर्शन को अपनाना आवश्यक है।
इस प्रकार दूब घास का महत्व सिर्फ धार्मिक पूजा में ही नहीं, बल्कि शरीर और स्वास्थ्य के लिए भी अद्वितीय है। बाहरी लेप के रूप में इसका प्रयोग चोट, जलन और रक्तस्राव में राहत देता है, वहीं आंतरिक रूप में इसका सेवन पेट, मासिक धर्म और दोष संतुलन के लिए उपयोगी है। नवरात्रि या किसी भी दिन इसे सही तरीके से अपनाकर व्यक्ति स्वास्थ्य और आध्यात्मिक लाभ दोनों प्राप्त कर सकता है।
