
भगवान कृष्ण क्या समझाना चाहते हैं..
यह बात बुद्धि नहीं, जीवन तक पहुँचे…
कृष्ण क्या समझाना चाहते हैं?
“नायं देहो देहभाजां नृलोके…”
इस श्लोक के माध्यम से कृष्ण यह मूल बात कहते हैं कि—
मनुष्य का यह शरीर केवल खाने-कमाने, सुविधा जुटाने और भोग करने के लिए नहीं है।
लेकिन आज की सभ्यता ठीक उल्टा कर रही है।
मनुष्य सुबह से रात तक सिर्फ़ शरीर के लिए जी रहा है—
अच्छा घर, बेहतर गाड़ी, बड़ा पद, ज़्यादा पैसा…
और आत्मा?
उसके बारे में न सोच, न शिक्षा, न चिंता।
शरीर के पीछे भागने का खतरा
कृष्ण बताते हैं कि यह रास्ता खतरनाक है, क्योंकि—
शरीर नाशवान है
आत्मा अविनाशी है
मृत्यु के बाद आत्मा को दूसरा शरीर लेना ही पड़ता है
(तथा देहान्तरप्राप्तिः)
जो व्यक्ति यह नहीं जानता, वह अंधेरे में जीता है।
उसे नहीं पता कि इस शरीर के नष्ट होने के बाद उसका क्या होगा।
“अंधे अंधों को चला रहे हैं”
इसी स्थिति को श्रीमद्भागवत में बहुत तीखे शब्दों में कहा गया है—
अन्धा यथान्धैरुपनीयमानाः…
अर्थात्—
जो खुद नहीं जानते कि वे कौन हैं,
वे दूसरों का मार्गदर्शन कर रहे हैं।
आज का दृश्य देखिए—
आत्मा को न मानने वाले गुरु बने बैठे हैं
भोग को ही लक्ष्य मानने वाले सभ्यता सिखा रहे हैं
और परिणाम—समाज दिशाहीन, तनावग्रस्त, असुरक्षित
मूढ़ता क्या है?
कृष्ण के अनुसार मूढ़ व्यक्ति वह नहीं जो अशिक्षित है,
बल्कि वह है—
जो समझता है कि मैं यह शरीर हूँ
जो यह नहीं जानता कि वह प्रकृति के बंधन में है
जो यह नहीं सोचता कि अगले जन्म में क्या होगा
आज कोई बड़ा अधिकारी है, नेता है, उद्योगपति है—
पर कृष्ण कहते हैं—
अगला शरीर उसकी पदवी नहीं, उसके कर्म तय करेंगे।
यदि कर्म पशु जैसे हुए—
तो अगला शरीर भी पशु का हो सकता है।
यदि कर्म जड़ जैसे हुए—
तो वृक्ष का शरीर भी मिल सकता है।
कृष्णभावनामृत का उद्देश्य
यहीं से भगवान कृष्ण का वास्तविक संदेश शुरू होता है।
कृष्णभावनामृत आन्दोलन कोई संप्रदाय नहीं,
यह स्मरण है—
कि हम शरीर नहीं, आत्मा हैं
कि हमारा असली घर यह संसार नहीं
कि जीवन का उद्देश्य भोग नहीं, बोध है
कृष्ण चाहते हैं कि मनुष्य—
अज्ञान से बाहर आए
कर्म को समझे
और ऐसा जीवन जिए जिससे अगला चरण भयावह न हो
सरल निष्कर्ष
शरीर के लिए जीना = पशु जीवन
आत्मा को समझना = मानव जीवन
कृष्ण को समझना = सुरक्षित भविष्य
कृष्ण हमें डराते नहीं—
वे जगाते हैं।
जो अभी चेत गया,
वह आने वाले अंधकार से बच गया।
हरे कृष्ण।
दासानुदास चेदीराज दास
