महाभारत केवल कुरुक्षेत्र के मैदान में नहीं हुई थी। महाभारत तो उस दिन शुरू हो गई थी, जब ‘हम’ की जगह ‘मैं’, ‘धर्म’ की जगह ‘मेरा’ और ‘कर्तव्य’ की जगह ‘अहंकार’ ने स्थान ले लिया था।
महाभारत का सबसे बड़ा कारण न राज्य था, न हस्तिनापुर, न सिंहासन और न ही संपत्ति। इन सबके पीछे यदि कोई एक मूल कारण था, तो वह था—अहंकार।
दुर्योधन का अहंकार कहता था—”मैं झुकूँगा नहीं।”
दुःशासन का अहंकार कहता था—”मैं किसी का सम्मान नहीं करूँगा।”
कर्ण का अहंकार बार-बार उसे यह सिद्ध करने को विवश करता रहा कि वह किसी से कम नहीं।
यहाँ तक कि भीष्म, द्रोण और धृतराष्ट्र भी अपने-अपने मोह और अहं के कारण समय पर सत्य का साथ नहीं दे सके।
अहंकार की सबसे बड़ी पहचान यही है कि उसमें केवल तीन शब्द रहते हैं—”मैं, मैंने और मेरा।”
वहाँ न सत्य के लिए स्थान बचता है, न न्याय के लिए और न ही दूसरे के सम्मान के लिए।
आज भी परिवार टूटते हैं तो संपत्ति से पहले अहंकार टकराता है।
समाज बँटता है तो विचारों से पहले अहंकार भिड़ता है।
राजनीति में संघर्ष होता है तो नीतियों से पहले अहंकार सामने आ जाता है।
यही कारण है कि आज भी हर घर, हर संस्था और हर समाज में छोटी-बड़ी महाभारतें होती रहती हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अहंकार को मनुष्य के पतन का एक बड़ा कारण बताया है—
“अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः॥”
(गीता 16.18)
अर्थात, जो मनुष्य अहंकार, दर्प और अपने स्वार्थ में डूब जाता है, वह सत्य से दूर होता चला जाता है।
इसलिए यह समझना आवश्यक है कि महाभारत कभी शस्त्रों से शुरू नहीं होती, वह विचारों से शुरू होती है। जब मन में “मैं” इतना बड़ा हो जाए कि “तुम” और “हम” के लिए कोई स्थान न बचे, तब संघर्ष अनिवार्य हो जाता है।
जहाँ अहंकार समाप्त होता है, वहीं से संवाद शुरू होता है।
जहाँ संवाद शुरू होता है, वहीं महाभारत समाप्त हो जाती है।
यही महाभारत का शाश्वत संदेश है—राज्य जीतने से बड़ा है स्वयं पर विजय पाना। क्योंकि जिसने अपने अहंकार को जीत लिया, उसके जीवन में कभी महाभारत नहीं होती।
दासानुदास चेदीराज दास @
