
5 वर्ष अर्थात 1825 दिनों से निराहार महाव्रत पूर्ण के दरम्यान 4500 किलोमीटर नर्मदा परिक्रमा की पैदल यात्रा सहित उनके कई काम गोल्डन बूक आफ रिकार्ड में दर्ज
कोई उन्हें दादा गुरु कहता है, कोई उन्हें सद्गुरु कहता है, कोई उन्हें धुनीवाले दादा का अवतारी मानता है, पर जो भी हो वे एक परम संत है, महान आत्मा है जिन्होंने अपने पंचतत्व के इस शरीर में इन पञ्च महाभूतों को जीत लिया है, शरीर की 72 हजार नाड़ियों में प्रमुख इडा. पिंगला और सुष्म्ना नाडी को जाग्रत कर चुके है तभी भूख,प्यास,निंदा के वे जितेन्द्रिय है यही कारण है कि वे पांच सालों से सिर्फ नर्मदा जल पीकर जीवित हैं। वह प्रवचन के दौरान एक घूंट भी पानी नहीं पीते हैं। पूरे दिन में सिर्फ नर्मदा नदी का एक लीटर शुद्ध जल पीते हैं। इस जल को पीकर वह पूरी तरह से फिट हैं। नर्मदा जल पर कोई कैसे जीवित रह सकता है। इसे लेकर इन पर शोध भी हुआ है। मध्य प्रदेश सरकार ने उनकी असाधारण शारीरिक सहनशक्ति पर वैज्ञानिक शोध को भी मंजूरी दी थी। नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज जबलपुर की विशेषज्ञ टीम ने उन पर 22 से 29 मई 2024 के बीच रिसर्च कर 124 पन्नों की रिपोर्ट भी प्रस्तुत की थी। रिपोर्ट में उपवास संबंधी मामूली बदलाव पाया गया। साथ ही दादा गुरु की अद्वितीय प्रतिक्रिया, शारीरिक अनुकूलन और अत्यधिक सहनशक्ति को इसकी वजह बताया गया। वहीं, दादा गुरु चौथी बार नर्मदा परिक्रमा कर रहे हैं। वह तीन बार पैदल परिक्रमा पूरी कर चुके हैं। चौथी बार की इस परिक्रमा उनके लिए अद्वितीय है जिसमे उनके साथ एक कुत्ता उन्हें मिला और लिपटकर रोने लगा तभी से वह भी दादागुरु के साथ नर्मदा परिक्रमा का हिस्सा हो गया है। तभी दादा गुरु ने कहा था कि यह कुत्ता भी नर्मदा परिक्रमा करेगा। तभी से वह साथ है। वह चौथी बार भी दादा गुरु के साथ नर्मदा परिक्रमा कर रहा है।
नर्मदा दर्शनमात्र से वह पूण्य प्रदान करती है जो गंगास्नान से मिलता है, पर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में मध्य प्रदेश के अमरकंटक में नर्मदा नदी संरक्षण जागरूकता कार्यक्रम के समापन समारोह में शामिल हुए. तब राज्य सरकार ‘नमामि देवी नर्मदे सेवा यात्रा’ का समापन पर सकी थी जिसमें पूर्व में केंद्र सरकार से से प्राप्त 1,066 करोड़ रुपये की धनराशि नर्मदा नदी को प्रदूषण मुक्त के नाम पर खर्च करने के बाद भी धरातल पर कुछ भी नजर नहीं आ रहा था की इसी दरम्यान दादागुरु का जबलपुर में प्रथम प्रकृति पर्यावरण संसद का आयोजन में देश के पर्यावरणविद व प्रकर्ति पर्यावरण संरक्षण को मौजूदगी में जल शुद्धिकरण,गोवंश आधारित प्राकृतिक कृषि की नवाचार प्राचीन पद्धति के प्रयोग ओर क्रियान्वयन हेतु निर्णय लिया जाकर उसका पालन किए जाने की सहमति हेतु नर्मदा मिशन तैयार किया गया। मिशन संचालक संत दादागुरु श्री भैयाजी सरकार से एक भेंट में उन्होने नर्मदामिशन को इस सदी की सबसे बड़ी मुहिम बताते हुये कहा कि पूर्व में नदियों के तटों पर मजदूरों द्वारा रेत का उठाव होता था किन्तु माँ नर्मदा के उद्गम से भड़ुच तक यह परम्परा बंद हो गई जिसमें लाखों रेत उठानेवाले लोग बेरोजगार हुये वही सरकार ने अपने नदी, पहाड़, खेत खलियान ओर जंगल को निजी पूँजीपतियों को ठेके पर दे दिया। दादागुरु ने कहा कि माँ नर्मदा का हृदय इन लोगों ने पोक मशीन-जेबीसी से छलनी कर नर्मदा के बीच धार में मशीनों से उत्खनन कर उनके अस्तित्व को मिटाने के कुत्सित कार्य शुरू कर दिया, इसलिए वे राज्य ओर केंद्र सरकार को जगाने के लिए 4 साल से बिना अन्न के महाव्रत साधना कर 4000 किलोमीटर पैदल चल चुके है। उनके कार्यों ओर उपलब्धियों पर अब तक 11 विशिष्ट कार्यों को विश्व रिकार्ड में दर्ज किया गया किन्तु सरकार की कमजोरी के रहते पर्यावरण एवं नदियों के साथ छेड़छाड़ बंद नही हुई।
दादा गुरु श्री भैया जी सरकार का कहना है, ओर जिसे कोई भी कही भी अपनी आंखो से देख सकता है जहा नर्मदा के आँचल में चोबीसों घंटे पोकमशीन, जेबीसी मशीन सहित आधुनिक उत्खनन के यंत्र स्थापित कर रेत निकाले जाने से नर्मदा की संपदा लूटने वालों ने नर्मदा को जीर्ण क्षीर्ण कर दिया है जिससे नर्मदा के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा हो गया है परिणामस्वरूप औंकारेश्वर में अब नर्मदा लुप्त हो गई है, अगर इसे रोका नहीं गया तो नर्मदा मिट जाएगी। सरकार इस बात को खुद स्वीकार कर चुकी है ओर नर्मदा को जीवित इकाई मानकर काम करना चाहती है ओर विधानसभा पटल पर रिपोर्ट भी आती है की जी प्रकार नर्मदा का दोहन हो रहा है अगर रोका नहीं गया तो 30 साल बाद नर्मदा एक क्विदंती बनकर रह जाएगी । आश्चर्य की बात है की प्रदेश सरकार कोरी बातें ही कर रही है, धरातल पर नर्मदा को बचाने का उनका कोई इरादा नहीं है, तभी सरकार लंबी तानकर सोई हुई है ओर नष्ट हो रहे पर्यावरण ओर नर्मदा को लेकर कुछ काम नहीं हो रहा है, जिसे जानते समझते हुये नर्मदा को बचाने के लिए महायोगी दादागुरु जी का निराहार सत्याग्रह शुरू हुआ किन्तु सरकार शोहरत पाने का नशा बड़ा निराला है जो संत दादागुरु प्रतिदिन नर्मदा जल का सेवन कर 4 साल से निराहार रहकर यह संदेश दे रहे है की नर्मदा का जल, जल नहीं अमृत है जो प्राणों को भी भोजन देता है उसकी बात मानकर नर्मदा का बचाव करने की बजाय विधायक, नेता मंत्री उन दादागुरु संत के साथ अपना फोटो खिचवाकर चेनलों ओर अखवारों की हेडिंग तो बनकर खुद को सनातनी साबित करना चाहते है किन्तु सनातन को पोषित नहीं करना चाहते है।
केंद्र ओर राज्य सरकार देख चुकी है की दादाजी भैया जी सरकार के कार्य विश्वस्तर पर छाए हुये है ओर उनकी आठ-दस उपलब्धि गोल्डन बूक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज हो गई है। देखा जाये तो पर्यावरण, प्रकृति गोवंश संरक्षण एवं माँ नर्मदा के अस्तित्व को बचाने हेतु दादागुरु देश के विभिन्न प्रान्तों में 2 लाख किलोमीटर से अधिक यात्राये कर जनजागरण अभियान चलाये हुये है। उन्हे पवित्र नदियों तथा प्रकृति पर्यावरण के संरक्षण के लिए 4 वर्ष से अधिक अखण्ड निराहार व्रत किए है इसी क्रम में जब उनके तीन वर्ष अखण्ड निराहार के पूर्ण हुये तब गोल्डन बूक आफ वल्ड रिकार्ड में दर्ज किया गया। यही नहीं दादागुरु के सानिघ्य ओर मार्गदर्शन में जबलपुर की संस्कार कावड़ यात्रा रन फार नेचर भी कावड़ियों द्वारा दादाजी के सानिघ्य में नर्मदा का अमृतजल ई कावड़ में शिवस्वरूप देववृक्ष को 35 किलोमीटर पैदल चलने पर गोल्डन बूक आफ वर्ड में दर्ज की जा चुकी है। समर्थ वृक्ष रक्षा संकल्प दिवस पर 3100 लोगों ने वृक्षों के गले लगाकर रक्षा सूत्र बांध उनकी सुरक्षा का वचन दादागुरु की उपस्थिती ओर मार्गदर्शन में सम्पन्न किए जाने पर गोल्डन बूक आफ वर्ड रिकार्ड में स्थान पाया वही पर तीन लाख लोग दादा गुरु के आव्हान पर जबलपुर नगर निगम के स्वच्छता अभियान में शामिल हो जबलपुर शहर को स्वच्छ ओर सुंदर तथा रोगमुक्त के नर्मदा मिशन पर उनका यह कार्य गोल्डन बूक आफ वर्ल्ड रिकार्ड मे स्थान पा सका। यही नहीं इसके साथ महाव्रत के दौरान तीन वार रक्त दान, 13 जुलाई 2023 को निराहार के 1000 दिन पूर्ण, निराहार के महाव्रत के चलते 3200 किलोमीटर की माँ नर्मदा की परिक्रमा पैदल करने, प्रकृति पर्यावरण के लिए प्रथम बार निरंतर 25 घंटे की सुर साधना की उपलब्धि दादा गुरु के नाम गोल्डन बूक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज हो गई है।
मुझे याद है नमामि गंगे, हर हर गंगे ,गंगा मैया के नाम पर गंगा मैया की साफ सफाई के कितने जुमले सरकार ने दिये ओर वर्ष 2014 से जून 2018 तक गंगा नदी की सफाई के लिए 3,867 करोड़ रुपये से अधिक राशि खर्च की जा चुकी है किन्तु गंगा की सफाई नही हो सकी ओर तमाम दावों के बात मोदी सरकार गंगा के तटीय क्षेत्रो की तमाम फेक्टरियों के निकल रहे जहर ओर गंदे नालों के जल को गंगा में मिलने से नही रोक सके, हाँ इतना अवश्य हुआ जो गंगा मैया की सफाई हेतु गंगा पुत्र सफाई में उतरा, गंगा का नहीं उसी का सफाया हो गया। ‘गंगा पुत्र’ नाम से विख्यात पर्यावरणविद् प्रोफेसर जीडी अग्रवाल उर्फ स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद 112 दिनों तक अनशन पर बैठे रहे किन्तु उनकी मांग पर न तो सरकार ने ध्यान दिया ओर न ही इस बाबत कोई विधेयक ही लाये जो, इनकी मांग थी, आखिरकार वे भूखे प्यासे ही गंगा को बिना कुछ न्याय दिलाये परलोक सिधार गए। चुकी इनसे पहले भी गंगा के ही मुद्दे पर 2011 में 115 दिन के अनशन के बाद स्वामी निगमानंद ने भी दम तोड़ दिया। ये दोनों का त्याग अविस्मरणीय रहेगा, किन्तु नर्मदामाटी के सपूत दादागुरु एक सच्चे संत है, महायोगी है इसलिए जहा ये सामान्य व्यक्ति अन्न का त्याग करने के बाद 115 दिन में ही अपने अपने प्राण दाव पर लगा चुके वही दादा गुरु की महासाधना बिना अन्न के 4 साल पूर्ण कर चुकी है जो विज्ञान के लिए चुनोतीपूर्ण है ओर विश्व के वैज्ञानिक डाक्टर उनके परीक्षण में लगे है जबकि वे निराहार रहकर भी अपनी सात सूत्रीय मांगों के साथ पैदल सत्याग्रह जारी रखे है। आश्चर्यजनक बात यह भी है की वे निराहार रहकर ध्यान, साधना में लगे रहते हुये नर्मदा क्षैत्र ही नही अपितु देश के अनेक प्रदेशों जिलों में धर्म सभाए, धर्म संवाद, जनजागरण, अखण्ड सत्संग, देववृक्षों की स्थापना पौधारोपन आदि चला रहे है।
देखा जाये तो 23 जनवरी को जबलपुर के समीप ग्राम पाटन में जन्मे नर्मदा माटी के सच्चे सपूत दादागुरु जीवजगत के उद्धार ओर प्रकृति पर्यावरण धर्म, धरा, धेनु सरक्षण संवर्धन हेतु माँ नर्मदा के हृदय को फोक मशीन-जेबीसी से छलनी कर उनके अस्तित्व को मिटाने के कुत्सित प्रयासों को रोकने हेतु 5 वर्षों से अखण्ड निराहार महाव्रत की साधना पूरी कर चुके है ओर आगे जारी है ताकि सरकार नदियों को मरणासन्न स्थिति में लाकर जीव जगत के लिए खतरे को रोक सके किन्तु समाज ओर सत्ता की उदासीनता महाप्रलय को आमंत्रित कर रही है। नर्मदासुत दादागुरु की 5 वर्षों से अर्थात 1825 दिन व्यतीत हो जाने के पश्चात उनके द्वारा एक अन्न का दाना अपने उदर में नहीं रखा ओर मात्र नर्मदा जल ग्रहण कर वे इस महाव्रत को ग्रहण कर नर्मदा मिशन जारी रखने हेतु सतत 4000 किलोमीटर तक की नर्मदा परिक्रमा कर यात्रा जारी रख सोये हुये मानस को जगाने की मुहिम जारी है जो विज्ञान, ज्ञान, आध्यत्म की सीमाओं से परे है। भारत ही नहीं अपितु अन्य देशों की चिंता दादा गुरु को है जंहा मानव द्वारा प्राकृतिक असंतुलन की सीमाओं को लांघा जाकर सृष्टि के लिए भी खतरा पैदा हो गया है, परंतु विनाशकाले विपरीत बुद्धि की कहावत को चरितार्थ करती हुई सरकारे इस ओर जागने को तैयार नहीं है।
