आज का विषय बहुत कोमल भी है और बहुत साहसी भी.. मानो सदियों से चले आ रहे एक मौन को पहली बार नाम दिया गया हो “माँ बनने से पहले एक मनुष्य” संवेदना, गीता‑दृष्टि और बिना आरोप की भाषा में शायद पसंद आए…
शहरनामा :
माँ बनने से पहले एक मनुष्य
माँ बनने की तैयारी
बहुत पहले शुरू हो जाती है—
शादी के बाद,
उम्मीदों के साथ,
सलाहों के साथ,
और “अब तुम्हें समझदार होना होगा”
जैसे वाक्यों के साथ।
पर किसी ने यह नहीं कहा—
माँ बनने से पहले
तुम एक मनुष्य हो।
मनुष्य से भूमिका तक
माँ बनने से पहले
वह हँसती थी—
बिना वजह।
थक जाती थी—
बिना अपराधबोध।
कुछ सपने
केवल अपने लिए देखती थी।
फिर धीरे‑धीरे
मनुष्य पीछे होता गया,
और भूमिका आगे।
अब हर सवाल
बच्चे से शुरू होता है,
और बच्चे पर ही खत्म।
बीच में
वह स्वयं
कहीं खो जाती है।
समाज की अधूरी अपेक्षा
समाज माँ से कहता है—
“अब तुम्हारा जीवन पूरा हो गया”
“अब तुम्हारी प्राथमिकता बदल जानी चाहिए”
“अब तुम्हें मजबूत रहना होगा”
पर कोई यह नहीं पूछता—
“क्या तुम ठीक हो?”
“क्या तुम थकी हो?”
“क्या तुम अब भी खुद को पहचानती हो?”
गीता इस मौन को तोड़ती है—
नात्मानमवसादयेत्
(गीता 6.5)
अपने आप को
गिरने मत दो।
यह श्लोक
माँ को नहीं,
मनुष्य को संबोधित करता है।
त्याग और विस्मरण का फर्क
माँ का त्याग
पवित्र होता है—
पर हर त्याग
आवश्यक नहीं।
जब त्याग
स्वेच्छा से न होकर
दबाव से हो,
तो वह
विस्मरण बन जाता है।
खुद को भूल जाना
साधना नहीं है।
गीता स्पष्ट है—
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्
(गीता 3.35)
अपना स्वभाव,
अपनी प्रकृति—
किसी भी भूमिका से बड़ी है।
एक शांत अपराधबोध
बहुत‑सी माँएँ
चुपचाप अपराधबोध में जीती हैं—
अगर अपने लिए समय लिया
अगर थकान जताई
अगर अकेले रहना चाहा
मानो
माँ होना
मनुष्य होने की
कीमत पर ही संभव हो।
गीता यह सौदा स्वीकार नहीं करती।
भक्ति: माँ का स्वयं से मिलना
भक्ति यहाँ
पूजा‑पाठ नहीं,
स्वयं को ईश्वर के सामने
जैसा है वैसा रख देना है।
जब माँ
कुछ क्षण
अपने लिए निकालती है—
तो वह स्वार्थी नहीं होती,
वह संतुलित होती है।
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां… योगक्षेमं वहाम्यहम्
(गीता 9.22)
यह श्लोक
माँ से कहता है—
सब कुछ तुम्हारे कंधों पर नहीं।
माँ तभी पूरी होती है
जब मनुष्य सुरक्षित हो।
जो माँ
खुद से जुड़ी है,
वही बच्चे को
स्वतंत्रता सिखा पाती है।
जो माँ
अपने मन को सुनती है,
वही बच्चे के मन को
समझ पाती है।
समापन
माँ होना
सम्मान है।
पर उससे पहले
मनुष्य होना
अधिकार है।
जो समाज
माँ से मनुष्य छीन लेता है,
वह अगली पीढ़ी को
थकी हुई चेतना देता है।
और जो माँ को
पहले मनुष्य मान लेता है,
वह बच्चों को
संतुलित जीवन देता है।