इस स्थान का इतिहास और परंपरा संगीत शिरोमणि स्वामी हरिदास जी से जुड़ी है जिन्होंने बांके बिहारी जी को अपनी भक्ति से प्रकट किया था। यहां के परिवेश में आज भी वही प्राचीन सादगी देखने को मिलती है जो भारतीय ऋषि परंपरा का मूल आधार रही है। परिसर के भीतर ऊंचे ऊंचे वृक्षों की घनी छांव और चारों ओर फैली प्राकृतिक हरियाली मन को अपार शांति प्रदान करती है। आधुनिक सुख सुविधाओं और विद्युत उपकरणों का त्याग कर यहां रहने वाले संत और साधक पूरी तरह ईश्वर की भक्ति और भजन में लीन रहते हैं। यहां का वातावरण इतना शांत है कि केवल पक्षियों का कलरव और भक्तों के मधुर संकीर्तन की ध्वनियां ही कानों में गूंजती हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस स्थान की मिट्टी और कण कण में दिव्य ऊर्जा का वास है। यहां आने वाले भक्त किसी भी प्रकार के दिखावे या आडंबर से दूर रहते हैं। टटिया स्थान में प्रकृति का संरक्षण और जीव सेवा सर्वोपरि है। यहां पेड़ों से गिरी सूखी लकड़ियों का ही उपयोग किया जाता है और किसी भी जीवित वृक्ष को क्षति पहुंचाना वर्जित है। सादगी का आलम यह है कि यहां के निवासी और साधु संत जमीन पर ही बैठकर अपनी साधना पूर्ण करते हैं। यह स्थान उन लोगों के लिए एक जीवंत उदाहरण है जो भौतिकता की दौड़ से थककर वास्तविक शांति और आत्मिक आनंद की खोज में भटक रहे हैं।
अनुशासन और मर्यादा के मामले में यह स्थान अत्यंत कठोर नियमों का पालन करता है। परिसर के भीतर मोबाइल फोन का प्रयोग या शोर शराबा करना पूरी तरह वर्जित है ताकि साधकों की एकाग्रता में कोई बाधा न आए। यहां की स्वच्छता और सात्विकता को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो भगवान श्री कृष्ण की लीलाएं आज भी अदृश्य रूप में यहां संचालित हो रही हों। वृंदावन के अन्य व्यावसायिक केंद्रों के विपरीत यह स्थान अपनी मौलिकता और प्राचीनता को संजोए हुए है जो न केवल श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है बल्कि भारतीय संस्कृति के संरक्षण का एक सशक्त स्तंभ भी है।
