
शहरनामा में आज:- कर्म पर विराम—जब जीवन ईश्वर की आरती बन जाए
जीवन के रास्तों पर चलते-चलते मन अचानक पूछ बैठता है—
“कर्म पर विराम कब लगेगा?”
और भीतर से एक दिव्य स्वर आता है—
“जब कर्म मेरे लिए होगा, मेरे में होगा, मेरे द्वारा होगा।”
गीता कहती है—
यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
यदि कर्म भगवान के लिए न हो तो वह बंधन बन जाता है।
यह संसार कर्मों की बाढ़ से भरा है—
दफ्तर के काम, परिवार की दौड़, महत्वाकांक्षा की लहरें…
परंतु भक्ति कहती है—
कर्म तब तक चलता है, जब तक मनुष्य स्वयं को कर्ता मानता है।
जिस दिन मन कहता है—
“प्रभो, मैं कुछ नहीं…
आप ही कर्ता, मैं तो केवल आपका दास, आपका वाद्य, आपका पात्र।”
उसी दिन “कर्म” भगवान की “आरती” बन जाता है।
और तब जीवन में एक मधुर परिवर्तन होता है—
जहाँ आज तक कर्म बंधन था,
वहीं वह भक्ति का पुल बन जाता है।
जहाँ फल की चिंता थी,
वहाँ प्रसाद की अनुभूति हो जाती है।
जहाँ दौड़ थी,
वहाँ शरणागति की शांति उतर आती है।
गीता 18.46 कहती है—
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः
जब मनुष्य अपने कर्म को भगवान की पूजा बना देता है, तभी उसे सिद्धि मिलती है।
मानो श्रीकृष्ण कह रहे हों—
“हे प्रिय,
तुम्हारे हाथ का हर कर्म तब तक अधूरा है
जब तक उस पर मेरी छाया न हो।”
भक्त के लिए कर्म बंद नहीं होता—
कर्म बदलता है।
वह अब संसार के लिए नहीं,
संसार के मालिक के लिए होता है।
तभी कर्म पर “विराम” लगता है—
क्योंकि अब वह कर्म नहीं,
सेवा बन चुका होता है।
जैसे—
किसान हल चलाए, पर मन में भगवान का स्मरण;
व्यापारी दुकान खोले, पर लाभ-हानि को भगवान को सौंप दे;
अधिकारी कलम चलाए, पर न्याय को भगवान का आदेश माने;
और साधक हर श्वास में कहे—
“हे कृष्ण, यह श्वास भी आपकी, यह कर्म भी आपका।”
जब जीवन इस भाव में ढल जाता है,
तो मनुष्य को पता ही नहीं चलता
कि कर्म का बोझ कब उतर गया,
और प्रभु के चरणों में भक्ति का फूल कब चढ़ गया।
कर्म चलता रहता है—
परंतु कर्ता भगवान हो जाते हैं।
और जहाँ भगवान कर्ता हों,
वहाँ न बंधन रहता है, न भय, न अपेक्षा—
केवल आनंद, केवल कृपा, केवल शरण।
शुभ रात्रि
हरे कृष्ण
दासानुदास चेदीराज दास
