तिथि और निशीथ काल का महत्व
पंचांग गणना के अनुसार, चतुर्दशी तिथि का आरंभ 15 फरवरी की शाम 5 बजकर 5 मिनट पर होगा और इसका समापन 16 फरवरी को शाम 5 बजकर 35 मिनट पर होगा। शास्त्रों के अनुसार, महाशिवरात्रि का व्रत उस दिन किया जाता है जिस दिन रात्रि के ‘निशीथ काल’ (मध्यरात्रि) में चतुर्दशी तिथि व्याप्त हो। इस आधार पर 15 फरवरी को ही मुख्य पर्व और उपवास रखा जाएगा।
ज्योतिषीय संयोग: सर्वार्थ सिद्धि और श्रवण नक्षत्र
इस वर्ष महाशिवरात्रि पर ज्योतिषीय गणनाएं विशेष फलदायी हैं। 15 फरवरी की रात 7 बजकर 48 मिनट तक उत्तराषाढ़ा नक्षत्र रहेगा, जिसके उपरांत ‘श्रवण नक्षत्र’ प्रारंभ होगा। श्रवण नक्षत्र को शिव उपासना के लिए शास्त्रों में ‘सिद्ध नक्षत्र’ माना गया है। इसके साथ ही सर्वार्थ सिद्धि योग का होना इस दिन किए गए दान, तप और अभिषेक के फल को अनंत गुना बढ़ा देता है।
पूजन विधि और अभिषेक का विधान
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महाशिवरात्रि भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह का उत्सव है। इस दिन श्रद्धालु प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर व्रत का संकल्प लेते हैं। पूजन की मुख्य विधि में शिवलिंग का पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल) से अभिषेक करना अनिवार्य माना गया है। भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए बेलपत्र, धतूरा, भांग, शमी पत्र और आक के पुष्प अर्पित किए जाते हैं। विवाहित महिलाएं माता पार्वती को श्रृंगार की सामग्री अर्पित कर अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं।
चार प्रहर की पूजा और रात्रि जागरण
महाशिवरात्रि पर रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। बहुत से श्रद्धालु रात भर जागकर चार प्रहर की पूजा संपन्न करते हैं। माना जाता है कि इस रात शिव तत्व पृथ्वी के अत्यंत निकट होता है, इसलिए की गई साधना सीधे महादेव तक पहुँचती है। देश के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों और शिवालयों में सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के लिए अभी से तैयारियां तेज कर दी गई हैं। प्रशासन को उम्मीद है कि इस विशेष योग के कारण मंदिरों में श्रद्धालुओं की संख्या पिछले वर्षों की तुलना में अधिक हो सकती है।
