
महर्षि चरक के अनमोल वचनों के अनुसार गाय का दूध इस धरती का अमृत है जिससे बनने वाले दही, मक्खन, घी तथा छाछ (मट्ठा) – ये सभी मन, बुद्धि को सात्त्विक बनाकर हमारी विवेक शक्ति, ओज, ऊर्जा, कान्ति की वृद्धि करते है जिसका प्रत्यक्ष भगवान श्रीकृष्ण अवतार के समय प्रत्येक घर गोपालन होता था ओर कृष्ण ने बचपन में गायों को विशेष महत्व दिया जिससे उनका नाम गोपाल भी हुआ। इस समय को छोड़ दिया जाये तो बीते हर युग में भारत के हर घर में गाय का होना ओर गाय का दूध पीना सभी की दिनचर्या का अंग रहा है। इस देश में गाय के दूध की नदिया बहती थी अर्थात हर घर में गाय के दूध का प्रचुर भंडार हुआ करता था जिसे पीकर हमारे पूर्वजों ने इस देश को विश्वगुरुः एवं सोने की चिड़िया कहलाने वाला देश बनाया था लेकिन जब से भैंस का दूध आया तभी से हृदयरोग, वातरोग, शुगर ने यहाँ के लोगों की बुद्धि और पाचनक्रिया का नाश कर देशवासियों को परमुखापेक्षी बना दिया। इसलिये गाय के दूध का कोई विकल्प आज तक नहीं है ओर गाय के दूध की इन्ही विशेषताओं के कारण गाय का दूध अमृत का स्थान पाये हुये है। जिसे यक्ष गीता में उल्लेखित उदाहरण से भी समझा जा सकता है जहां एक समय यक्ष ने युधिष्ठिर से अनेक प्रश्नो के क्रम में एक प्रश्न किया- ‘किममृतम्’ अमृत क्या है? युधिष्ठिर ने उत्तर दिया ‘गवामृतम्’ गाय का दुग्ध ही अमृत है, धर्मराज युधिष्ठर का यह कथ्य गाय के दूध को अमृत सिद्ध करता है ओर वेद गाय माता कि स्तुति कर यूं ही हमसे आव्हान नहीं करते कि – माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वलादित्यानाममुतस्य नाभिः। प्रयोघं चिकितुवे जगाय मा गामनागामदिर्ति वसिष्ठ ।। अर्थात – ‘गौ रुद्रों की माता, बसुओं की पुत्री, अदिति पुत्रों की बहिन और घृतरूप अमृत का खजाना है; प्रत्येक विचारशील पुरुष को चाहिए कि निरपराध एवं अवध्य गाय का न तो वध करे ओर न ही किसी को करने दे।जिसका पालन मुगल शासक अकबर ने कर मुगल सल्तनत में गायों के कत्लखाने बंद करा कर गोवध पर सजा दे रखी थी जिसे आज हमारी सरकार आंखे बंद कर गाय के कत्लखाने पर रोक लगाने में असफल साबित हुई है किन्तु गाय के दूध का कर्ज चुका नही सकी है।
गाय का दूध अमृत है इसके अनेक प्रसंग है एक अन्य उदाहरण भी मिलता है जब मुगल बादशाह अकबर ने अपने खास नवरत्न बीरबल से पूछा कि बीरबल दूध किसका अच्छा होता है? बीरबल ने बगैर देर लगाये तुरंत जवाब दिया, ‘जहाँपनाह ! दूध तो भैंस का अच्छा होता है।’ इस उत्तर पर अकबर को आश्चर्य हुआ और वे बोले- बीरबल ! ये क्या कह रहे हो, रोज तो तुम गाय की तारीफ करते नहीं थकते थे, पर जब आज हमने दरबार में दूध के विषय में पूछा तो तुम भैंस के दूध की तारीफ कर रहे हो? बीरबल ने कहा- जहांपनाह! पर आपने पूछा कि दूध किस जानवर का अच्छा होता है, तो मैंने भैंस का नाम लिया, यदि आपने अमृत पूछा होता तो मैं गोमाता का नाम लेता, गोमाता तो दूध नहीं, अमृत देती हैं। आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ भावप्रकाश के अनुसार- ‘गोदुग्ध रस एवं विपाक में मधुर, शीतल, स्निग्ध, गुरु और वृद्धावस्था के समस्त रोगोंका शामक है।’ गायका दूध पौष्टिक तत्त्वों का भण्डार है, इसमें जल 87, वसा 4, प्रोटीन 4, शर्करा 5 तथा अन्य तत्त्व 1 से 2 प्रतिशत तक पाये जाते हैं। गायके दूध में 8 प्रकार के प्रोटीन, 11 प्रकार के विटामिन्स, 12 प्रकार के पिगमेंट्स तथा 3 प्रकार की दुग्ध गैसें पायी जाती हैं। गायके दुधमे कैरोटीन नामक पदार्थ भैंस के दूध से दस गुना अधिक होता है। केवल गाय के दूध में ही विटामिन ‘ए’ होता है, जो किसी अन्य पशु के दूध में नहीं होता है। भैंस का दूध गरम करने पर उसके सर्वाधिक पोषक तत्त्व मर जाते हैं, जबकि गाय के दूध को गरम करने पर भी पोषक तत्त्व वैसे ही विद्यमान रहते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार माँ के दूध के पश्चात् गाय का दूध ही मानव के लिये सबसे ज्यादा उपयोगी है। गोदुग्ध में विद्यमान सेरिब्रोसाइस मस्तिष्क और स्मरण शक्तिके विकासमें सहायक होता है। स्ट्रानटाइन अणु विकारों का प्रतिरोध होता है और एम०डी०जी०आई० प्रोटीन के कारण रक्त कोशिकाओं में कैंसर प्रवेश नहीं कर सकता तथा गाय के दूध से कोलेस्ट्रॉल नहीं बनता है।
अथर्ववेद के प्रथम काण्ड के 22वें सूक्त में लिखा है कि लाल रंग की गाय के दूध दही, घी, मक्खन आदि से हृदय एवं पाण्डुरोग नष्ट होते हैं वही पर चरक संहिता में गाय के दूध के दस गुणों का वर्णन इस प्रकार किया गया है-स्वादु शीतं मृदु स्निग्धं बहलं श्लक्ष्णपिच्छिलम्। गुरु मन्दं प्रसन्नं च गव्यं दशगुणं पयः ॥(सूत्रस्थान २७। २१८) अर्थात् गायका दूध स्वादिष्ट, शीतल, कोमल, चिकना, गाढ़ा, सौम्य, लसदार, भारी और बाह्य प्रभाव को विलम्ब से ग्रहण करनेवाला तथा मन को प्रसन्न करने वाला होता है। इसी तरह सुश्रुतसंहिता में गाय के दूध के दही को स्निग्ध, विपाक में मधुर, पाचक, बलवर्धक, वातनाशक, शुद्ध एवं रुचिकारक कहा गया है-स्निग्धं विपाके मधुरं दीपनं बलवर्धनम् ।वातापहं पवित्रं च दधि गव्यं रुचिप्रदम् ।। (सु०सं० ४५।६७) गायके पाँच पदार्थों-पंचगव्य (दूध, दही, घृत, मूत्र तथा गोबर) – में अनेक बीमारियों के इलाज के गुण विद्यमान हैं। गाय से प्राप्त पदार्थों से ही पंचगव्य बनता है और पंचामृतमें भी इसका उपयोग होता है। गाय का दूध, दही, घी, मक्खन एवं छाछ (मट्ठा) अमृत का भण्डार है। इसी कारण कृतज्ञता- वश भारतवर्ष में गोमाता की घर-घर पूजा होती है।
गोमाता में ही ऐसी दिव्यता है कि जिसकी रीढ़ की हड्डी में सूर्यकेतु नाड़ी होती है, इसके सिवा दुनिया के किसी भी प्राणी में ऐसा नहीं है। इसी नाड़ी के क्रियाशील होने पर वह पीले रंग का एक पदार्थ छोड़ती है, जिसे स्वर्ण क्षार कहते हैं। इसके कारण देशी गाय का दूध, मक्खन, घी स्वर्ण कान्तियुक्त होता है। इस दूध को पीने से शरीर पूर्ण रूपसे रोगमुक्त हो जाता है। गाय का दूध तो धरती का अमृत है, इसलिये प्रत्येक मनुष्य को कम-से-कम 275 ग्राम दूध प्रतिदिन अवश्य पीना चाहिये। गोदुग्ध में यदि एक चम्मच गाय का घी मिलाकर पियें तो शरीर पुष्ट एवं बलवान् होता है। गायका दूध गर्म करके पीने से कफ का नाश होता है तथा उसी दूध को ठण्डा करके मिश्रीके साथ पीनेसे पित्तविकार का नाश होता है ओर शरीर की जलन शान्त करके अन्न पाचन में सहायक बनता है। गोमाता अत्यन्त सात्त्विक तथा ममतामयी होती हैं, इसीलिये गाय का दूध सात्त्विक होता है। गाय का दूध पतला होने से जल्दी हजम हो जाता है, इससे रस-रक्तादि धातुओं एवं स्मरणशक्ति की वृद्धि होती है। अच्छे विचारों एवं अच्छे कार्यों की ओर बुद्धि की प्रवृत्ति होती है। भोज्य पदार्थ या अन्न की अपेक्षा दूध जल्दी हजम होता है। दूध आप हर 2-2 घंटे बाद 4-6 बार थोड़ा-थोड़ा ले सकते हैं, दूध उतना ही लें जितना हजम हो जाय।
आयुर्वेद के अनुसार गाय के दूध के पथ्य से जिन रोगों में लाभ होता है वे है – जीर्ण ज्वर, अग्निमांद्य, तिल्लीवृद्धि, यकृतरोग, जलोदर, रक्तविकार, गंडमाला, अपस्मार, उन्माद, भ्रम, चक्कर, मूर्छा, उपदंश, विष और उससे उत्पन्न सभी प्रकार के दर्द, लकवा, लूलापन, शिर और नेत्ररोग, मस्तक शूल, मूत्राशय के रोग, पाण्डुरोग पीलिया, रक्तपित्त, प्यास, क्षय, हृदयरोग, छातीका दर्द, विषरोग, दवाओंकी उष्णता, अम्लपित्त, पेट शूल, उल्टियाँ, जुलाब, पेट फूलना, संग्रहणी, दस्त के विकार, मन के विकार आदि अनेक रोग केवल दूध के पथ्य से ठीक हो जाते हैं। गोमाता के दूध के इन्हीं गुणों के कारण ही सऊदी अरब में 7 लाख गायों उच्च तकनीकी से पालन कर फार्म चल रहे है जिसमें अलशफीजी नाम से अर्थात मेहरबान (कृपालु)- गाय के गुणों के हिसाब से रखा गया है। इस फार्ममें 90 हजार गायें हैं, जिनमें 30 हजार भारतीय नस्ल की हैं। इन्हीं भारतीय नस्ल की गायों का दूध रियाद स्थित शाही महल में जाता है। दूसरी नस्ल की गायों का दूध शाही परिवार पसन्द नहीं करता है। यहाँपर कोई गाय कत्ल नहीं की जाती।
हमारे देशकी देशी गायों के रंग के अनुसार दूध के गुण भी बदल जाते हैं, ये कितनी बड़ी विशेषता है। काली गायका दूध वातनाशक होता है तथा लाल रंग की गाय का दूध पित्तनाशक होता है, श्वेत गाय का दूध कफनाशक होता है। दोपहर में पिया जानेवाला गाय का दूध बलवर्धक, कफ-पित्तनाशक होता है तथा रात में पिया जाने वाला दूध दुर्बलता और बुढ़ापा दूर करने वाला होता है। आयुर्वेद के अनुसार सफेद गाय के दूध को यकृत की बीमारी में, बादामी रंगकी गाय के दूध को वातरोगमें, काली गाय के दूधको श्वास तथा फेफड़ों के रोग में अत्यन्त गुणकारी बताया गया है। सुश्रुतसंहिता में गाय के घी के सम्बन्ध में लिखा है कि गाय का घी विपाक में मधुर, शीतवीर्य, वात-पित्त और बिम्ब का नाश करनेवाला, आँखों की ज्योति एवं शरीरकी सामर्थ्य को बढ़ानेवाला है और गुणों में अति श्रेष्ठ है-विपाके मधुरं शीतं वातपित्तविषापहम् । चक्षुष्यमग्रयं बल्यं च गव्ययं सर्पिर्गुणोत्तरम्॥ गोघृत आँखों के लिये विशेष फायदेमन्द होता है। श्यामा गाय के घी से गठिया, कुष्ठरोग, जले-कटे घाव के दाग, नेत्रविकार, जलन, मुँह का फटना आदि पर आश्चर्यजनक लाभ होता है। गायका घी ऐन्टीसेप्टिक होता है। गाय के घी तथा दूध में कैंसरीय तत्त्वों से लड़ने की क्षमता होती है। जो शक्ति गोघृत में मिलती है, वह अण्डे या मांसाहारसे नहीं मिलती है।
वैज्ञानिकोंकी मान्यता है कि 10 ग्राम घी जलाने से 1 टन से अधिक ऑक्सीजन पैदा होती है तथा वायुमण्डल में एटामिक रेडिएशनका प्रभाव कम हो जाता है। इसीलिये देवी-देवताओं की प्रसन्नता के लिये उनकी पूजा में गाय के घी-दूध का ही प्रयोग होता दूध से घी बनता है, उसी तरह जमाये हुए दहीमें चौथाई भाग पानी मिलाकर मथानी से मथकर मक्खन निकालकर मट्ठा (छाछ) बनता है। यह मट्ठा पचनेमें अत्यन्त हलका, मल-मूत्र साफ करनेवाला, पाचक तथा अन्य द्रव्यों को पचाने वाला, अतिसार, संग्रहणी, वायु, पीलिया, पेट शूल, मूत्रकृच्छ्र, हैजा, मूत्राघात, अश्मरी, उदर रोगों में अमृत के समान गुणकारी होता है। यदि आपको वातविकार है तो मट्ठा सेंधा नमक मिलाकर लें, यदि पित्तविकार है तो मट्ठा- शक्कर मिलाकर लें तथा जिनको कफविकार है, वे सोंठ, सेंधा नमक, कालीमिर्च और पीपल मिलाकर लें, यदि आप मूत्रकृच्छ्रकी समस्या से ग्रसित हैं तो आप मट्ठा-गुड़ मिलाकर लें, पाण्डुरोग में चित्रकचूर्ण मिलाकर लें। इस तरहसे गोमाताके दूध, घी, मट्ठा तीनों ही महान् गुणकारी तथा रोगोंका नाश करनेवाले ।
गाय के दूध के इसी अमृतमयी गुणों के कारण ही हमारे ऋषि-मुनि, राजा-महाराजा गो माता को अपने पास बड़े आदरपूर्वक रखते थे और उनकी पूजा किया करते थे। राम, कृष्ण, वसिष्ठ, जमदग्नि-जैसे महात्मा गोमाता को प्राणों से बढ़कर रखते थे और उनसे मनोवांछित फल प्राप्त किया करते थे। आज फिरसे यदि हम पुराने गौरवको पाना चाहते हैं तो हमें गोमाताकी शरणमें जाना ही पड़ेगा। यदि ऐसा न करेंगे तो हम अपने खोये हुए गौरव को वापस कभी नहीं पा सकते। आप सभी से आग्रह है की अगर रख सकते हों तो एक गाय जरूर रखें, यदि आप नहीं रख सकते तो गाय का दूध, घी और मट्ठा जरूर अपने भोजन में शामिल करें, यदि ऐसा भी नहीं कर सकते तो आप गायों के प्रति सहानुभूति रखें, उन्हें कोई प्रताड़ित कर रहा हो तो उनकी रक्षा करें। गोपालक भगवान कृष्ण की गौ माता के साथ वाली तस्वीर अपने घर में लगाने में जैसे आप अपने लिए सात्विक वातावरण पसंद करते हो वैसे ही मान सम्मान अपनी गोमाता के प्रति रखे ओर जिस प्रकार आज उनकी दुर्गति हो रही है उसे तत्काल रोककर मानवता का परिचय दे तभी गोमाता का वर्चस्व बना रहेगा, स्मरण रहे गाय होगी तो आप होंगे, बिना गाय आपका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।
आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
