फरवरी का महीना आते ही वातावरण में एक अलग प्रकार की हलचल दिखाई देने लगती है। बाजारों में लाल रंग की सजावट, उपहारों की भरमार, सामाजिक माध्यमों पर प्रदर्शित संबंध, और वेलेंटाइन डे तथा प्रॉमिस डे के नाम पर बढ़ती व्यावसायिक सक्रियता ये सब केवल एक उत्सव का विस्तार नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के संकेत हैं। इस दृश्य को देखकर मन बार-बार उस भारत की ओर लौटता है जहाँ विवाह केवल आकर्षण या व्यक्तिगत पसंद का विषय नहीं था, बल्कि कुल, वंश और धर्म की निरंतरता का आधार था।
सनातन व्यवस्था में विवाह को ‘संस्कार’ कहा गया। संस्कार का अर्थ है जीवन को परिष्कृत करने वाली प्रक्रिया। गृह्यसूत्रों में विवाह को षोडश संस्कारों में स्थान दिया गया है। मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति में स्पष्ट रूप से वर्णित है कि विवाह के माध्यम से ही धर्म, अर्थ और संतति की शुद्ध परंपरा चलती है। महाभारत में कुलधर्म की रक्षा को अत्यंत महत्त्वपूर्ण बताया गया है-कुल के नष्ट होने पर समाज में अराजकता फैलती है। विवाह में अग्नि के समक्ष लिए गए सप्तपदी वचन केवल प्रतीकात्मक नहीं थे; वे जीवनपर्यंत निष्ठा, संयम और उत्तरदायित्व की प्रतिज्ञा थे।
मैंने अपने घर में भी यही परंपरा देखी। मेरी माता और पिता ने विवाह से पहले एक-दूसरे को देखा तक नहीं था। हमारा विवाह भी परिवार की सहमति से हुआ। सीमित समय में, कुटुंब की उपस्थिति में एक बार मिलना ही पर्याप्त माना गया। आज की दृष्टि से यह असाधारण लग सकता है, पर उस समय विश्वास की जड़ें गहरी थीं। दाम्पत्य स्नेह विवाह के बाद विकसित होता था और वही स्थायी होता था, क्योंकि उसका आधार कर्तव्य था, क्षणिक आकर्षण नहीं।
इतिहास के पन्नों में भी यह व्यवस्था दिखाई देती है। यूनानी दूत मेगस्थनीज जब चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में आया, तब उसने भारतीय समाज की संरचना का उल्लेख किया। उसने लिखा कि यहाँ लोग अपनी जाति के बाहर विवाह नहीं करते और अपनी परंपरागत वृत्ति नहीं बदलते। उसने ब्राह्मणों के तप, संयम और दीर्घ ब्रह्मचर्य का वर्णन किया। वह लिखता है कि भारतीय समाज में आहार-विहार के नियम कठोर हैं, लोग पवित्रता का ध्यान रखते हैं, और सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन सहज नहीं होता। उसने यह भी लिखा कि विवाह और सामाजिक संरचना में अनुशासन है। यह उल्लेख किसी भारतीय आचार्य का नहीं, बल्कि बाहरी पर्यवेक्षक का है, इसलिए उसका ऐतिहासिक महत्व विशेष है। इससे स्पष्ट है कि विवाह और कुल-मर्यादा भारतीय समाज की स्थिरता के मूल स्तंभ थे।
अब वर्तमान स्थिति पर दृष्टि डालें। स्वतंत्रता के बाद विधि-व्यवस्था में अनेक परिवर्तन हुए। 1955 में हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत विवाह-विच्छेद की कानूनी व्यवस्था स्थापित हुई। यह व्यवस्था कुछ परिस्थितियों में आवश्यक रही होगी, विशेषकर जहाँ अत्याचार या असहनीय जीवन स्थितियाँ हों। परंतु इसके साथ विवाह की धारणा में परिवर्तन आया-विवाह अब केवल संस्कार नहीं, विधिक अनुबंध भी बन गया।
2011 की जनगणना के अनुसार भारत में तलाकशुदा व्यक्तियों का प्रतिशत लगभग 0.24% था, जो पश्चिमी देशों की तुलना में कम है। किंतु महानगरों के पारिवारिक न्यायालयों के आँकड़े बताते हैं कि पिछले बीस वर्षों में तलाक याचिकाओं की संख्या में तीव्र वृद्धि हुई है। दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे नगरों में प्रतिवर्ष हजारों नए मामले दर्ज हो रहे हैं। शहरी मध्यवर्ग में विवाह-विच्छेद अब दुर्लभ घटना नहीं रहा।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2019-21) के आँकड़े दर्शाते हैं कि शहरी क्षेत्रों में संयुक्त परिवारों की संख्या घट रही है और एकल परिवार बढ़ रहे हैं। संयुक्त परिवार में मतभेद प्रायः भीतर ही सुलझ जाते थे; बुजुर्ग मध्यस्थ की भूमिका निभाते थे। आज पति-पत्नी के बीच संवाद की कमी सीधे न्यायालय तक पहुँच जाती है।
सांस्कृतिक वातावरण भी बदला है। चलचित्र, धारावाहिक और डिजिटल मंच विवाह-पूर्व और विवाहेतर संबंधों को सामान्य जीवनशैली की तरह प्रस्तुत करते हैं। फरवरी के सप्ताह में उपहार उद्योग और आतिथ्य क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज होती है। संबंध अब निजी नहीं, सार्वजनिक प्रदर्शन का विषय बनते जा रहे हैं। आकर्षण और तात्कालिक निकटता को स्थायी दांपत्य से अधिक महत्त्व मिलता दिखाई देता है ।
संयुक्त परिवार व्यवस्था क्यों आवश्यक है यह प्रश्न आज अत्यंत प्रासंगिक है। संयुक्त परिवार केवल आर्थिक संरचना नहीं, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा का तंत्र है। बच्चों को मूल्य, अनुशासन और परंपरा का संस्कार वहीं मिलता है। बुजुर्गों का अनुभव संकट की घड़ी में मार्गदर्शन देता है। जब परिवार विखंडित होता है, तो व्यक्ति अकेला पड़ जाता है; मतभेद संवाद से अधिक संघर्ष में बदलते हैं।
सनातन परंपरा में कुल और वंश की रक्षा को धर्म का अंग माना गया है। चारित्रिक मूल्य निष्ठा, संयम, मर्यादा इनके बिना कोई भी सभ्यता स्थायी नहीं रह सकती। 2026 की वास्तविकता यह है कि तलाक की दर अभी भी पश्चिम जितनी नहीं, पर शहरी क्षेत्रों में वृद्धि स्पष्ट है। विवाह-पूर्व और विवाहेतर संबंधों की सामाजिक स्वीकृति बढ़ी है। लिव-इन संबंध सामान्य चर्चा का विषय बन चुके हैं।
आवश्यक यह है कि अधिकार और दायित्व का संतुलन पुनः स्थापित हो। विवाह को केवल व्यक्तिगत विकल्प न मानकर सामाजिक उत्तरदायित्व के रूप में देखा जाए। शिक्षा में चरित्र-निर्माण पर बल दिया जाए। परिवारों में संवाद और परामर्श की परंपरा विकसित हो।
