
भारत की स्वाधीनता को 77 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन देश का एक बड़ा हिस्सा आज भी अपनी स्वतंत्र पहचान के लिए संघर्ष कर रहा है—ये हैं डिनोटिफाइड, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदाय, जिन्हें हम डीएनटी, एनटी, एसएनटी समुदाय के नाम से जानते हैं। अनुमान लगाया जाता है कि इनकी जनसंख्या आठ से ग्यारह करोड़ के बीच है, पर विडंबना यह है कि भारत की किसी भी राष्ट्रीय जनगणना ने इन्हें कभी अलग श्रेणी में नहीं गिना। इसी कारण 2027 की प्रस्तावित जनगणना को लेकर इन समुदायों में नई आशा जन्मी है, क्योंकि पहली बार उनकी पहचान साफ़-साफ़ दर्ज होने की संभावना बन रही है।
इन समुदायों की पीड़ा इतिहास की धूल में दबी पड़ी है। 1871 के क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट ने लगभग 150–200 समुदायों को “जन्मजात अपराधी” घोषित कर दिया था। 1952 में यह कानून भले ही खत्म हुआ, लेकिन समाज की नज़रों में अपराधीकरण का दाग अब तक नहीं मिटा। आज भी कई जगह पुलिस निगरानी, सामाजिक भेदभाव और अविश्वास का सामना उन्हें करना पड़ता है।
स्वतंत्र भारत की जनगणनाओं में इन समुदायों के लिए अलग जगह न होना भी एक और बड़ी कमी रही है। सरकार का तर्क यह रहा कि इनकी पहचान राज्य-वार सूचियों में पहले से मौजूद है, लेकिन विशेषज्ञ इसे नीति की अस्पष्टता और प्रशासनिक सुस्ती बताते हैं। स्थिति इतनी जटिल है कि एक ही समुदाय एक राज्य में अनुसूचति जाति (एससी), दूसरे में अनुसूचित जनजाति (एसटी), तीसरे में ओबीसी और कहीं-कहीं किसी भी सूची में नहीं मिलता। नतीजतन योजनाओं, छात्रवृत्तियों, आरक्षण और पुनर्वास में भारी असमानताएँ पैदा होती हैं।
वस्तुत: कई आयोगों ने तो यहाँ तक उल्लेख किया है कि इन समुदायों के नाम पर आने वाला फंड अक्सर उनसे पहले ही किसी और द्वारा खपा लिया जाता है। स्थायी पते की कमी ने इन्हें पहचान-पत्रों, राशन कार्डों, बैंकिंग सुविधाओं और स्वास्थ्य योजनाओं से भी दूर रखा है। ‘रेन्के कमीशन’ ने कहा था कि सरकारी संसाधन इन समुदायों तक शायद ही पहुँच पाते हैं। दो बड़े आयोग, रेनके (2008) और इदाते (2018) ने विस्तृत अध्ययन कर कई महत्वपूर्ण सिफारिशें कीं, पर उनका क्रियान्वयन आज भी बेहद सीमित है। सुप्रीम कोर्ट भी इस विषय को सरकार की नीति का हिस्सा मानकर हस्तक्षेप से पीछे हट गया है, जिससे इन समुदायों की निगाहें अब पूरी तरह केंद्र सरकार के निर्णय पर टिकी हैं।
दुखद यह है कि भारत के मीडिया और राष्ट्रीय विमर्श में भी ये समुदाय लगभग अदृश्य बने हुए हैं। जहाँ सामाजिक न्याय की बहसें अक्सर एससी/एसटी/ओबीसी के इर्द-गिर्द घूमती हैं, वहीं डीएनटी, एनटी, एसएनटी समुदायों का उल्लेख मुश्किल से देखने को मिलता है। विशेषज्ञ इसे “भारत का अदृश्य सामाजिक वर्ग” कहते हैं, लेकिन इस अँधेरे में भी आशा की किरण है। 2027 की जनगणना यदि इन्हें अलग पहचान दे दे, तो पहली बार देश को इनके वास्तविक आँकड़े मिलेंगे, नीतियाँ सटीक बनेंगी, फंडिंग का लक्ष्यीकरण बेहतर होगा और सदियों पुरानी उपेक्षा को दूर करने की दिशा में निर्णायक कदम उठाया जा सकेगा।
यही कारण है कि इन समुदायों का कहना है, “पहचान ही अधिकार का पहला कदम है।” इन सबके बीच एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के घुमंतू–अर्धघुमंतू समुदायों के बीच गहरा और निरंतर काम किया है। संघ के स्वयंसेवकों ने प्रशासन के साथ मिलकर 50,000 से अधिक परिवारों को आधार कार्ड, राशन कार्ड और पहचान-पत्र उपलब्ध कराए, जिससे वे पहली बार सरकारी योजनाओं और जनकल्याण व्यवस्था से जुड़ सके।
संघ द्वारा संचालित कौशल विकास कार्यक्रमों, जैसे सिलाई, बढ़ईगीरी, हस्तशिल्प, कृषि तकनीक, मोबाइल रिपेयरिंग और लोककला प्रशिक्षण ने अनेक परिवारों में आत्मनिर्भरता का नया भाव जगाया है। शिक्षा, स्वास्थ्य, नशामुक्ति और सामाजिक समरसता से जुड़े कार्यक्रमों ने समुदायों का आत्मविश्वास बढ़ाया है और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
इस पूरे परिदृश्य में एक बात स्पष्ट है कि भारत का यह बड़ा और बहु-आयामी सामाजिक वर्ग अब भी मान्यता और सम्मान की प्रतीक्षा में है। 2027 की जनगणना उनके लिए सिर्फ आँकड़ों का सवाल नहीं है, यह तो उनकी पहचान और सम्मान की पहली सीढ़ी है। देश यह कदम कब और कैसे उठाता है, यही आने वाले समय में इन समुदायों के भविष्य का निर्धारण करेगा।
(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता एवं स्तम्भकार हैं)
