
नमोस्तु ते पुण्यजले,नमों मकरगामिनी ।
नमस्ते पापमौचिन्ये नमो देवी वरानने॥ स्कन्धपुराण,रेवाखण्ड 12,2
अर्थात-पवित्र जल वाली नर्मदे, तुम्हें नमन। मकरवाहिनी माँ तुम्हें नमन।
सुंदरमुखवाली देवी, पाप से मुक्त करने वाली देवी तुम्हें बारम्बार नमन ॥
महाभारतकाल में नर्मदा को तीर्थ का स्थान प्राप्त हो गया था तभी महाभारत के अनुशासनपर्व में 26/48 के अनुसार नर्मदा में स्नान करने तथा नर्मदाके तट पर एक पखवाड़े तक संयमित होकर नर्मदा की आराधना करने वाला मनुष्य राजश्री की पदवी पा जाता ओर वह राजा हो जाता। महाभारत में नर्मदा की उत्पत्ति मेकल पर्वतश्रेणी के वंशगुल्म जिसे बाँसों का कुंज कहा है से होना बतलाया है। वशिष्ठ सहिंता में नर्मदा के जन्म को लेकर वशिष्ठ जी द्वारा श्रीराम को कही गई कथा में भी उल्लेख मिलता है कि ‘‘माघ शुक्ल सप्तमी, अश्वनी नक्षत्र,रविवार के दिन मकर राशि में सूर्य के स्थित रहने पर मध्यान काल में पृथ्वी पर अमरकंटक कि पावन धरा पर मेकल पर्वत से नर्मदा का जन्म हुआ है।’’
शिवपुराण में अमरकंटक के लिए “”ओमकारम्मरकंटके”” की उपमा देकर शिव के साथ अमरकंटक व नर्मदा का अलौकिक संबंध कहा है कि “नर्मदा” के साथ लोग शिव को “हर” बोलकर “नर्मदे हर” का उच्चारण कर शिव ओर नर्मदा को एक साथ स्मरण करते है। नर्मदा के महत्व को अनेक पुराणों ने व्यक्त किया है ओर मत्स्य पुराण में कहा गया है कि “जो व्यक्ति अरण्य तीर्थ अर्थात अमरकंटक की प्रदीक्षणा करता है उसे सम्पूर्ण पृथ्वी की प्रदीक्षणा होना माना है।” इतना ही मत्स्य पुराण में नर्मदा को लेकर कहा गया है कि “नर्मदा सभी स्थानों पर पवित्र है ओर नर्मदा जल के दर्शनमात्र से लोग पवित्र हो जाते है।’’ कूर्मपुराण में नर्मदा के परिक्रमा करने वाले व्यक्ति को पुंडरिक यज्ञ करने के पुण्य की प्राप्ति होती है। स्कन्दपुराण के अनुसार नर्मदा के दोनों ओर के सभी तट तीर्थ है ओर नर्मदा का जल अमरकंटक क्षैत्र में अमृततुल्य, ओषधियुक्त गुणकारी, अक्षयकारी,स्वास्थवर्धक,स्फूर्तिदायक एवंशक्तिदायकहै।यही कारण है कि अमरकंटक क्षैत्र अनेक अनुसंधानकर्ताओ, ऋषिमुनियों व योगियो कि शरणस्थली रहा है ओर इस क्षैत्र कि विलक्षण विविधता,अरण्य कि सौंदर्यता एवं पावनता को आमंत्रित करते कपिलधारा जलप्रपात, दूधधारा जलप्रपात, शंभूधारा जलप्रपात, सोनमुड़ा जल प्रपात तथा लक्ष्मणधारा जलप्रपात आदि प्रमुख है।
समूचे विश्व में जो दिव्य व रहस्यमयी है तो वह नर्मदा है। नर्मदा का वर्णन चारों वेदों की व्याख्या में विष्णु के अवतार वेदव्यास जी ने स्कन्द पुराण के रेवाखण्ड में किया है। रामायण और महाभारत में भी नर्मदा का उल्लेख मिलता है। कालिदास ने नर्मदा को सोमप्रभवा कहा है और रघुवंश में भी नर्मदा का उल्लेख मिलता है। मेघदूत में नर्मदा का वर्णन रेवा और नर्मदा दो नामों से किया गया है। नर्मदा विश्व की एकमात्र नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है। पुराणों के अनुसार गंगा में स्नान से जो फल मिलता है, नर्मदा के दर्शन मात्र से ही उस फल की प्राप्ति होती है। नर्मदा एकमात्र ऐसी नदी है जो पूर्व से पश्चिम काबा की ओर बहती है जिससे मुसलमानों के मन में भी नर्मदा को लेकर गहरी आस्था है। कहा जाता है कि भगवान शंकर ने अमरकण्टक के मैकल पर्वत पर 12 वर्ष की दिव्य कन्यारूप प्रकट की और देवताओं ने इस कन्या का नाम नर्मदा रखा। नर्मदा को शिव से वरदान मिला है कि वह प्रलयकाल में भी विद्यमान रहेंगी और पापों का नाश करेंगी। नर्मदा का हर पत्थर-कंकड शिवलिंग के रूप में बिना प्राणप्रतिष्ठा के पूजित होता है और विश्व के अनेक शिव मंदिरों में इसी नर्मदा के दिव्य पत्थर नर्मदेश्वरशिवलिंग के रूप में विराजमान है। दूसरे शिवलिंगों की प्राणप्रतिष्ठा की जाती है परन्तु नर्मदा से निकलने वाले नर्मदेश्वर शिवलिंग बिना प्राणप्रतिष्ठा के पूजित है। अनेक स्थानों पर उल्लेख मिलता है कि देवता ही नहीं अपितु ऋषिमुनि,भगवान गणेश,कार्तिकेय,राम लक्ष्मण,हनुमान आदि ने नर्मदा के तट पर तपस्या करके सिद्धिया प्राप्त की है।
नर्मदा के प्रणय को लेकर अनेक क्विदंतिया है जिनमें राजा मैखल की पुत्री का नाम नर्मदा है और राजा ने अपनी बेटी की शादी के लिये घोषणा की कि जो राजकुमार गुलवकावली का फूल लेकर आयेगा उसके साथ उनकी बेटी नर्मदा का विवाह होगा। सोनभद्र फूल ले आया जिससे नर्मदा का विवाह तय हो गया। नर्मदा तब तक सोनभद्र से नहीं मिली थी। नर्मदा ने अपने दासी जुहिला के हाथ सोनभद्र को सन्देश दिया और जुहिला ने नर्मदा से राजकुमारी के वस्त्र और आभूषण मांगे और खुद पहनकर सोनभ्रद से मिलने पहुच गयी। सोनभद्र ने जुहिला को राजकुमारी समझ लिया और जुहिला की नीयत डाबाडोल हो गयी और उसने सोनभद्र का प्रणय स्वीकार कर लिया। काफी समय बीतने के बाद जब जुहिला नहीं पहुची तब नर्मदा खुद सोनभ्रद से मिलने आ गयी और उसने दोनों को साथ पाकर नाराज होकर उल्टी दिशा में चलना शुरू कर दिया इसके बाद नर्मदा अरब सागर में जा पहुची। नर्मदा तभी से क्वारी कन्या के रूप मं विख्यात होकर सभी की पूजनीय बन गयी।
अनेक किवदंतियों व कथाओं में नर्मदा को लेकर कई तरह की बातें की गयी है वहीं एक प्रसंग में उल्लेख मिलता है कि नर्मदा के अवतरण की कथा पुरूरवा से जुड़ी है। स्कन्धपुराण में उल्लेख है कि नर्मदा का पहला अवतरण सतयुग में हुआ तथा दूसरा अवतरण राजा हिरण्यतेजा के तप से हुआ। युधिष्ठिर ने मार्कण्डेय जी से पूछा कि महाराज हिरण्तेजा ने नर्मदा को किस प्रकार पृथ्वी पर उतारा था? तब बताया गया कि चन्दवंश में जम्बूद्वीप अर्थात भारत में हिरण्यतेजा प्रसिद्ध राजा हुये जिन्होंने लाखों गायें,सोना हीरे-जवाहर,घोड़े-हाथी आदि का दान कर अपने पितरों के जलपान देने व उनकी मुक्ति हेतु उदयाचल पर्वत पर भगवान शिव की उपासना की। शिवजी प्रकट हुये किन्तु उन्होंने नर्मदा को पृथ्वी पर उतारने से इंकार कर दिया बाद में राजा की कठोर तपस्या एवं परोपकारी भावना को जानकर वे राजी हो गये और भगवान शंकर के पसीने से नर्मदा की उत्पत्ति हुई और भगवान शंकर ने नर्मदा को उदयाचल पर उतरने के लिये प्रस्तुत किया। नर्मदा अपने उदगम अमरकंटक से भुगुकच्छ (भड़ोच)तक कल-कल का कलरब कर बहते हुये खुद मार्ग तलाशती अरब सागर में समाहित हो गयी। हिन्दुस्थान ही नहीं अपितु विश्व की एकमात्र नदी नर्मदा ही है जिसकी परिक्रमा बड़ी आस्था, लगन और विश्वास के साथ की जाती है और आदिकाल से आत्मभाव से विभोर ऋषिमुनि, तपस्वी ही नहीं अपितु कई राजाओं ने राजपाट त्यागकर माॅ नर्मदा के तटों को अपना साधनास्थली बनाकर साधना में लीन रहकर अपना जीवन नर्मदा के तट पर बिताया।
प्रदेश की जीवनदायिनी पुण्य सलिला माँ नर्मदा देश की एकमात्र ऐसी विलक्षण नहीं है जो पश्चिम से काबा की ओर बहती हुई चली जबकि अन्य नदियां या तो दक्षिणमुखी है या पूर्व के सागरों में जाकर मिलती है। यही कारण है कि नर्मदा को पश्चिमीवाहिनी गंगा भी कहा जाता है। नर्मदा के काबा की ओर प्रवाहित होने पर कई मुस्लिम शासकों ने नर्मदा के तट पर अपने राजमहल और स्मारक बनाये जिनमें राजा मांडू के पठान और खिलजी राजमहलों के अलावा नर्मदापुरम (होशंगाबाद) में मुस्लिम पितुहंता अल्प खाँ जिसे बाद में राजा होशंग कि उपाधि मिली, का किला भी है,कालान्तर में दिलावर खान के हत्यारे बेटे अल्प खान के नाम से नर्मदापुर के पावन नाम का परिवर्तन कर होषंगाबाद कर दिया गया। 600 साल से मुगल हत्यारे के नाम होशंगाबाद का कलंक नर्मदाजयंती के अवसर पर धुला जब पुण्य सलिला माँ नर्मदा के जन्मोत्सव 19 फरवरी 2021 को आयोजित नर्मदाजयंती महोत्सव में प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के द्वारा पूर्व से होशंगाबाद का नाम बदलकर नर्मदापुरम करने की सार्वनिक की ओर अब यह नगर अपनी पूर्ववत पहचान नर्मदापुरम के नाम से पहचाना बना चुका है
