मन को अब शास्त्र से उतरकर सड़क, घर, दफ्तर और मन के भीतर ले चलते हैं—जहाँ मन का असली युद्ध रोज़ लड़ा जाता है।
मन का युद्ध और कृष्ण — दैनिक जीवन के दृश्य
यह युद्ध कुरुक्षेत्र में नहीं है।
यह सुबह अलार्म बंद करने के बाद शुरू हो जाता है।
1. सुबह का युद्ध : मन बनाम बुद्धि
अलार्म बजता है।
बुद्धि कहती है—
“उठो, जप करो, दिन सही शुरू होगा।”
मन तुरंत बोलता है—
“पाँच मिनट और… भगवान पूरे दिन में कहीं भी मिल जाएंगे।”
पाँच मिनट पचास हो जाते हैं।
फिर हम कहते हैं—
“आज मन नहीं लगा।”
गीता चुपचाप मुस्कुराती है—
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्
— (गीता 6.5)
उठाना था आत्मा को,
पर हमने मन को मालिक बना दिया।
कृष्ण-शरण यहाँ क्या है?
पूरी साधना नहीं—
बस इतना कहना:
“हे कृष्ण, उठने की शक्ति दीजिए।”
और उठ जाना।
युद्ध वहीं जीत लिया जाता है।
2. दफ्तर का दृश्य : अपमान और क्रोध
कोई सहकर्मी ताना मार देता है।
शब्द साधारण हैं,
पर मन का वेग उन्हें हथियार बना देता है।
क्रोध कहता है—
“अभी जवाब दे दो।”
बुद्धि तर्क देती है—
“हाँ, चुप रहे तो कमजोर समझे जाएंगे।”
और शाम तक मन कहता है—
“आज मन अशांत है।”
गीता साफ कहती है—
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
— (गीता 2.63)
क्रोध से भ्रम,
भ्रम से स्मृति का नाश।
कृष्ण-शरण यहाँ क्या है?
उत्तर देने से पहले मन में एक क्षण—
“हे कृष्ण, यह मैं नहीं, यह मेरा मन है।”
वह एक क्षण
क्रोध को कमज़ोर कर देता है।
3. घर का दृश्य : अधिकार और अपेक्षा
घर आते हैं।
थके हैं।
मन कहता है—
“अब सब मुझे समझें।”
जब वैसा नहीं होता—
तो भीतर से आवाज़ आती है—
“कोई मेरी कदर नहीं करता।”
यह अहंकार का वेग है।
गीता यहाँ चुप नहीं रहती—
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।
— (गीता 4.21)
अपेक्षा ही दुख की जननी है।
कृष्ण-शरण यहाँ क्या है?
सेवा को पूजा मान लेना।
और मन में कहना—
“हे कृष्ण, यह परिवार भी आपका है, मैं आपका सेवक हूँ।”
अधिकार ढीला पड़ते ही
शांति प्रवेश करती है।
4. मोबाइल, वासना और मन की चोरी
रात को फोन हाथ में है।
देखना कुछ और था,
खुल कुछ और गया।
मन कहता है—
“बस देख लो, नुकसान क्या है?”
यहीं आत्मा हारती है।
गीता चेतावनी देती है—
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
— (गीता 2.62)
ध्यान → संग → आसक्ति → पतन
कृष्ण-शरण यहाँ क्या है?
फोन रखते समय बस एक नाम—
“कृष्ण।”
इतना ही।
नाम मन की गति तोड़ देता है।
5. पैसे और भविष्य की चिंता
आज सब ठीक है,
पर मन कहता है—
“कल क्या होगा?”
चिंता भविष्य की नहीं,
नियंत्रण की लालसा की है।
गीता यहाँ सीधी बात कहती है—
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
— (गीता 9.22)
जो मुझे केंद्र बनाता है,
उसकी चिंता मैं उठाता हूँ।
कृष्ण-शरण यहाँ क्या है?
योजना करना—
पर परिणाम कृष्ण पर छोड़ देना।
6. असफलता के बाद का मन
कुछ गलत हो गया।
मन कहता है—
“तुमसे कुछ नहीं होगा।”
यह तमोगुण का अंतिम वार है।
गीता हाथ पकड़ती है—
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति।
— (गीता 6.40)
सच्चा प्रयास कभी नष्ट नहीं जाता।
कृष्ण-शरण यहाँ क्या है?
खुद को दोष देने के बजाय कहना—
“हे कृष्ण, मुझे सिखाइए।”
7. अंतिम सत्य (दैनिक भाषा में)
हम रोज़ हारते इसलिए हैं
क्योंकि हम रोज़
मन से सलाह लेते हैं, कृष्ण से नहीं।
कृष्ण-शरण कोई साधु बनने की शर्त नहीं है।
यह बस इतना है—
निर्णय से पहले एक स्मरण
प्रतिक्रिया से पहले एक नाम
गिरने के बाद एक स्वीकार
और धीरे-धीरे—
मन सेवक बनता है,
बुद्धि साफ होती है,
और आत्मा मुक्त साँस लेती है।
हरी कृष्ण
शुभ प्रभात
दासानुदास चेदीराज दास