मुरैना। महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर अपनी मनोकामनाओं को पूर्ण करने के लिये भगवान शिव की आराधना हेतु जिले के एतिहासिक, पुरातात्विक एवं बड़े धार्मिक शिवालयों पर श्रद्धालुओं का जनसैलाव आज सुबह से ही उमड़ रहा है। जिले के ईश्वरा महादेव, अलोपी शंकर, महाकाल मंदिर, बनखण्डेश्वर मंदिर, कोल्हुआ मंदिर, जयेश्वर महादेव मंदिर सहित सभी मंदिरों पर सुबह से ही श्रद्धालुओं का पहुंचना आरंभ हो गया। मुरैना के मुक्तिधाम में स्थित महाकाल मंदिर पर भक्तगण विभिन्न प्रकार से अभिषेक कर रहे है। भगवान शिव का अभिषेक करने के साथ ही श्रद्धालु पूजा अर्चना कर रहे हैं। युवा श्रद्धालु जहां बेहतर जीवन साथी की मनोकामना को पूर्ण करने के लिये पूजा अर्चना करते दिखाई दे रहे हैं वहीं आम श्रद्धालु सुखी जीवन तथा अपने संतान के शांती सुरक्षा के जीवन की कामना कर रहे हैं। शहर के महाकाल मंदिर, बनखण्डेश्वर मंदिर, रामजानकी मंदिर, मारकण्डेश्वर मंदिर, बिहारी जी मंदिर, गुफा मंदिर, पशुपतिनाथ मंदिर, ककनमठ, बटेश्वरा, कुतवार, घिरोना मंदिर सहित सभी शिव मंदिरों पर दोपहर बाद तक श्रद्धालुओं का सैलाव देखा जा रहा है। मंदिरों पर व्यवस्थापकों ने पूजा अर्चना के साथ-साथ श्रद्धालुओं को भगवान शिव का सहज दर्शन व पूजा हो सके इसकी पूर्ण व्यवस्थायें कीं गईं हैं। भगवान शिव की पूजा में लीन महिला व पुरुष श्रद्धालुओं का कहना है कि आज के दिन भगवान शिव की पूजा अर्चना कर अपने जीवन मेंं सुख, शांती, समृद्धि की कामना किये जाने पर पूर्ण हो जाती है।
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पहाडग़ढ़ के जंगल में ईश्वरा महादेव के साथ-साथ आमझिर व बरई कोट पर पहुंचे श्रद्धालु
पहाडग़ढ़ के घनघोर जंगल में स्थित ईश्वरा महादेव सहित आमझिर व बरई कोट पर श्रद्धालुओं का सैलाव आज सुबह के प्रथम प्रहर से ही आरंभ हो गया। शिवलिंग पर निरंतर चल रही जलधारा से निर्मित कुण्ड में श्रद्धालुओं द्वारा स्नान कर भगवान शिव का अभिषेक व पूजा अर्चना की जा रही है। ईश्वरा महादेव के विषय में किवदंती है कि रावण के भाई विभीषण ने की थी यहां पर तपस्या उनके ही द्वारा स्थापित किया गया था। यह स्थान जिले के आदिवासी विकासखण्ड पहाडग़ढ़ मुख्यालय से 17 किलोमीटर दूर घनघोर जंगल में पहाड़ी के नीचे स्थापित है। इस शिवलिंग का महात्म इस वजह से भी प्रमुख माना जाता है कि जंगल में तीन पत्ती से लेकर 21 पत्ती तक के बेलपत्र पाये जाते हैं। यहां रोरी का भी पेड़ पाया जाता है। ईश्वरा महादेव से कुछ ही दूरी पर आमझिर नामक स्थान पर महादेव पार्वती के पास से जल प्रवाह होकर जल अभिषेक होता रहता है। इसी तरह बरई कोट शिवलिंग पर भी निरंतर जल प्रवाहित होता रहता है। घनघोंर जंगल में होने के बावजूद भी इन स्थानों पर श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूर्ति के लिये पहुंचकर पूजा अर्चना कर रहे हैं।
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पहाडग़ढ़ के जंगल में ईश्वरा महादेव के साथ-साथ आमझिर व बरई कोट पर पहुंचे श्रद्धालु
पहाडग़ढ़ के घनघोर जंगल में स्थित ईश्वरा महादेव सहित आमझिर व बरई कोट पर श्रद्धालुओं का सैलाव आज सुबह के प्रथम प्रहर से ही आरंभ हो गया। शिवलिंग पर निरंतर चल रही जलधारा से निर्मित कुण्ड में श्रद्धालुओं द्वारा स्नान कर भगवान शिव का अभिषेक व पूजा अर्चना की जा रही है। ईश्वरा महादेव के विषय में किवदंती है कि रावण के भाई विभीषण ने की थी यहां पर तपस्या उनके ही द्वारा स्थापित किया गया था। यह स्थान जिले के आदिवासी विकासखण्ड पहाडग़ढ़ मुख्यालय से 17 किलोमीटर दूर घनघोर जंगल में पहाड़ी के नीचे स्थापित है। इस शिवलिंग का महात्म इस वजह से भी प्रमुख माना जाता है कि जंगल में तीन पत्ती से लेकर 21 पत्ती तक के बेलपत्र पाये जाते हैं। यहां रोरी का भी पेड़ पाया जाता है। ईश्वरा महादेव से कुछ ही दूरी पर आमझिर नामक स्थान पर महादेव पार्वती के पास से जल प्रवाह होकर जल अभिषेक होता रहता है। इसी तरह बरई कोट शिवलिंग पर भी निरंतर जल प्रवाहित होता रहता है। घनघोंर जंगल में होने के बावजूद भी इन स्थानों पर श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूर्ति के लिये पहुंचकर पूजा अर्चना कर रहे हैं।
