
शहरनामा में आज
संयम का पोस्टर और मन की गुप्त दुकान…
शहर में इन दिनों संयम का बड़ा शोर है।0कहीं व्रत, कहीं मौन, कहीं त्याग के पोस्टर, कहीं साधु-संतों जैसी भाषा। लेकिन शहर एक सवाल चुपचाप पूछ रहा है —इतना संयम दिखाने के बाद भी मन इतना अशांत क्यों है?
गीता इस सवाल का उत्तर
दो टूक शब्दों में देती है —
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥(श्रीमद्भगवद्गीता 3.6)
मतलब साफ़ है — जो व्यक्ति बाहर से इंद्रियों को रोक ले, लेकिन भीतर मन ही मन भोग की दुकान चलाता रहे, वह साधक नहीं, स्वयं को धोखा देने वाला वंचक है।
शहर में ऐसे लोग कम नहीं हैं। दिन में त्याग का भाषण, रात में मन की सिनेमा हॉल। ऊपर से सफ़ेद वस्त्र, भीतर से रंगीन इच्छाएँ और सबसे दिलचस्प बात यह है कि ऐसे लोग खुद को सबसे बड़ा संयमी मानते हैं।
गीता का सवाल कठोर है, लेकिन ईमानदार भी — क्या संयम केवल शरीर का है या मन का भी?यदि हाथ रुके हैं लेकिन कल्पनाएँ दौड़ रही हैं तो वह ब्रेक नहीं, क्लच दबाकर एक्सीलेटर दबाना है। शहर ने संयम को एक प्रदर्शन बना लिया है। जैसे त्याग कोई होर्डिंग हो और साधना कोई विज्ञापन पर गीता कहती है — जहाँ मन वश में नहीं, वहाँ त्याग एक छल है, और साधु एक पात्र।
गीता आगे रास्ता भी दिखाती है —
मन को खाली छोड़ने से
वह भोग की ओर ही भागेगा।
मन को रोकना नहीं,
कृष्ण में लगाना होगा।
जब मन ऊपर से नीचे नहीं, भीतर से बदलता है, तभी संयम बोझ नहीं, स्वाभाविक बनता है।
शहरनामा का निष्कर्ष इतना ही है — संयम यदि बाहर का अभिनय है और भीतर वासना का मंचन, तो वह साधना नहीं, स्वयं से किया गया सबसे बड़ा छल है।
दासानुदास चेदीराज दास
