श्रीमद्भागवतम्, स्कंध 8, अध्याय 22, श्लोक 9 के भावार्थ पर आधारित
राजा बलि और बामण (वामन) संवाद प्रस्तुत है—सरल, वैराग्यपूर्ण और कृष्ण–केंद्रित रंगमंचीय शैली में।
पात्र
राजा बलि – अहंकार से टूटता हुआ, विवेक की ओर बढ़ता राजा, वामन (बामण) – शांत, करुणामय, दृढ़ सत्य
सूत्रधार – दर्शकों से संवाद करने वाला
दृश्य 1 : यज्ञभूमि
(मंद प्रकाश। यज्ञ की वेदी। राजा बलि चिंतित मुद्रा में।
सूत्रधार मंच के एक कोने से बोलता है।)
सूत्रधार:
यह वही भूमि है जहाँ दान ने अहंकार को चुनौती दी
और एक राजा अपने “मेरेपन” के अंतिम छोर पर खड़ा है। (वामन प्रवेश करते हैं—छोटा स्वरूप, विशाल तेज।)
दृश्य 2 : प्रश्न
राजा बलि (हाथ जोड़कर): हे ब्राह्मणदेव, आपने मुझसे राज्य लिया, वैभव लिया, प्रतिष्ठा ली। अब बताइए— मेरे पास शेष क्या है?
वामन (शांत स्वर में):
राजन, जो गया, क्या वह सचमुच तुम्हारा था?
दृश्य 3 : देह का सत्य
राजा बलि (संकोच से): शायद नहीं प्रभु… पर यह शरीर तो मेरा है?
वामन:
यह भी नहीं, बलि। यह देह पाँच तत्वों का मेल है—
कुछ काल सेवा देगी और फिर प्रकृति इसे वापस ले लेगी। जब समय आएगा, आत्मस्वामी इस शरीर को छोड़ देगा।
(राजा बलि मौन में सिर झुका लेते हैं)
दृश्य 4 : समाज और संबंध
राजा बलि: तो फिर समाज, मित्र, कुटुंब— इनका क्या अर्थ है प्रभु..?
वामन:
यदि मैं केंद्र में न हूँ, तो वही मित्र, वही कुटुंब मोहग्रस्त जीव की श्रमपूर्वक अर्जित शक्ति और धन को अनजाने में खींच लेते हैं। यह दोष नहीं, मोह की प्रकृति है।
दृश्य 5 : पत्नी का प्रश्न
(राजा बलि थोड़ा रुककर, साहस बटोरते हैं)
राजा बलि:
और पत्नी, प्रभु..? जो जीव को सबसे प्रिय होती है?
वामन (करुण दृष्टि से):
पत्नी दोष नहीं है, राजन। पर “स्त्री” एक तत्त्व है— जो भौतिक विस्तार को बढ़ाता है। यदि वह भोग बढ़ाए, इच्छाएँ बढ़ाए और मुझे जीवन से दूर करे— तो वही संबंध बंधन है और यदि वही भक्ति बढ़ाए, त्याग सिखाए और हर कर्म मुझे अर्पित करे— तो वही संबंध मोक्ष का द्वार है।
दृश्य 6 : बोध
(प्रकाश राजा बलि पर केंद्रित)
राजा बलि:- अब मैं समझ गया, प्रभु।
समस्या शरीर में नहीं, समस्या संबंधों में नहीं—समस्या इस बात में है कि उनका स्वामी कौन है।
दृश्य 7 : समर्पण
(राजा बलि साष्टांग प्रणाम करते हैं)
राजा बलि:- यह शरीर भी आपका है, मेरी शक्ति भी आपकी है, और मेरा जीवन भी। जब यह देह छूटेगी, मैं आपको नहीं छोड़ूँगा।
वामन (आशीर्वचन):
इसीलिए, बलि, तुम हारे नहीं हो। तुमने वह पाया है जो न काल छीन सकता है न मृत्यु।
दृश्य 8 : उपसंहार
सूत्रधार (दर्शकों की ओर):
यह नाटक राजा का नहीं, हम सबका है। जो अंत में साथ नहीं जाता, उसे जीवन का स्वामी मत बनाओ।
(मंद प्रकाश। शंखनाद।)
समापन वाक्य (सामूहिक स्वर):
“कृष्ण को केंद्र में रखो— सब साधन बन जाएगा।”
शुभ प्रभात
दासानुदास चेदीराज दास
