
शहरनामा : भय… जो बाहर नहीं, भीतर रहता है…
शहर आजकल डर के मौसम में है।
डर हवा में नहीं—व्हाट्सएप में है।
डर गलियों में नहीं—सोच में है।
और सबसे बड़ा डर यह कि “मैं कौन हूँ?”—
इस सवाल से हम रोज़ बचकर निकल जाते हैं।
सुबह अख़बार खोलिए—डर।
शाम को टीवी लगाइए—डर।
रात को तकिए पर सिर रखते ही—डर।
कोई पूछे, “किस बात का?”
तो जवाब तैयार है—महँगाई, बीमारी, भविष्य, बच्चे, नौकरी, अकेलापन…
पर सच पूछिए तो डर इन सबसे नहीं है।
डर एक ही भूल से है—
जो हम नहीं हैं, उसे ही हम ‘मैं’ मान बैठे हैं।
शहर का आदमी कहता है—
“मैं यह शरीर हूँ।”
इसलिए उसे बुढ़ापे से डर लगता है।
“मैं यह पद हूँ।”
इसलिए ट्रांसफर से डर लगता है।
“मैं यह पहचान हूँ।”
इसलिए अपमान से डर लगता है।
और जब कुछ छिनता है,
तो आदमी नहीं रोता—
उसकी गलत पहचान रोती है।
भगवान श्रीकृष्ण ने यह बात बहुत पहले,
बिना माइक और बिना मंच के,
भगवद्गीता में कह दी थी—
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥
मतलब साफ है—
शरीर बदलता है, मैं नहीं बदलता।
जो यह समझ गया,
उसके लिए डर एक अफ़वाह बनकर रह जाता है।
पर शहर की समस्या यह है कि
यहाँ अफ़वाहें ज़्यादा तेज़ चलती हैं,
और ज्ञान हमेशा ट्रैफिक जाम में फँसा रहता है।
यहाँ आदमी आईने में शरीर देखता है
और आत्मा को सीसीटीवी कैमरे की तरह
बस टाँगकर भूल जाता है।
कठोपनिषद ने तो और साफ़-साफ़ कहा था—
जो भूत–भविष्य, जन्म–मरण, लाभ–हानि से परे है,
उसे जानो।
पर शहर ने इस सलाह को भी
“पुरानी फाइल” समझकर
अलमारी के सबसे नीचे रख दिया।
डर का गणित बड़ा सीधा है—
जो मिटने वाला है,
उससे जुड़ोगे—तो डरोगे।
जो बदलने वाला है,
उसे पकड़ोगे—तो घबराओगे।
और जो न मिटता है, न बदलता है,
उसे जान लोगे—
तो डर खुद रास्ता बदल लेता है।
शहर में लोग कहते हैं—
“डर हटाने के लिए साहस चाहिए।”
पर सच्चाई यह है—
डर हटाने के लिए सही पहचान चाहिए।
जिस दिन आदमी यह समझ ले कि—
“मैं तन नहीं, मन नहीं, पद नहीं—
मैं तो वह हूँ जो इन सबको देख रहा है,”
उस दिन डर
पिछली बारिश की तरह
बस याद बनकर रह जाता है।
शहरनामा का निष्कर्ष इतना ही है—
डर कोई राक्षस नहीं,
एक गलतफहमी है।
और गलतफहमी का इलाज
लड़ाई नहीं,
जागरण है।
बाकी…
शहर तो चलता रहेगा।
डर भी रहेगा।
पर जो जान गया कि वह कौन है,
उसके लिए
भय सिर्फ़ एक खबर रह जाती है—
जो पढ़ी जाती है,
जिया नहीं जाता।
दासानुदास चेदीराज दास
