
श्रीमद् भगवत गीता शहर से लौटती हुई पदचाप और गांव में जगते नए सपने की कथा है।
यह nostalgia नहीं, संभावना का दस्तावेज़ है।
**रिवर्स माइग्रेशन, डिजिटल गांव
और गांव बनाम ग्लोबल सपना**
(या जब भविष्य ने यू-टर्न लिया)
एक समय था—
गांव छोड़ना सफलता था।
आज कई युवा चुपचाप लौट रहे हैं—
बिना घोषणा, बिना ढोल।
1. रिवर्स माइग्रेशन: हार नहीं, थकान
यह वापसी
शहर से हारकर नहीं है,
शहर से थककर है।
महंगे कमरे
अनंत ट्रैफिक
अस्थायी रिश्ते
स्थायी तुलना
शहर ने रोज़गार दिया,
पर जीवन नहीं।
2. डिजिटल गांव: खेत में नेटवर्क
आज गांव में—
इंटरनेट है
ऑनलाइन काम है
यूपीआई है
ज़ूम मीटिंग है
खेत के किनारे बैठा युवा
विदेशी क्लाइंट से बात करता है।
यह वही गांव है
जिसे कभी “पिछड़ा” कहा गया था।
3. गांव का नया आत्मविश्वास
अब गांव कहता है—
“अगर काम लैपटॉप से हो सकता है,
तो शहर क्यों ज़रूरी?”
यह प्रश्न
सिर्फ सुविधा का नहीं,
सम्मान का है।
4. ग्लोबल सपना: दूरी और दबाव
ग्लोबल सपना चमकदार है—
डॉलर
ब्रांड
इंटरनेशनल लाइफ
पर इसके साथ आता है—
अकेलापन
जड़ों से कटाव
पहचान का संकट
गीता बहुत सरलता से कहती है—
स्वधर्मे निधनं श्रेयः
— (गीता 3.35)
दूसरे का सपना
हमेशा सुख नहीं देता।
5. गांव बनाम शहर नहीं, गांव + दुनिया
यह लड़ाई
गांव बनाम शहर की नहीं है।
यह सवाल है— “क्या हम स्थानीय रहकर
वैश्विक हो सकते हैं?”
डिजिटल गांव का उत्तर है—
हाँ।
6. नई पीढ़ी का नया संतुलन
नई पीढ़ी—
गांव की मिट्टी चाहती है
और दुनिया का एक्सपोज़र भी
वे बैलगाड़ी नहीं चाहते,
पर खेत भी छोड़ना नहीं चाहते।
7. खतरा भी है
डिजिटल गांव के साथ खतरा—
जमीन का कॉर्पोरेट कब्ज़ा
गांव का “रिसॉर्ट” बन जाना
स्थानीय संस्कृति का इंस्टाग्राम संस्करण
अगर सावधान नहीं रहे,
तो गांव फिर किसी और का सपना बन जाएगा।
8. कृष्ण-केंद्रित दृष्टि
कृष्ण कहते हैं—
योगः कर्मसु कौशलम्
— (गीता 2.50)
कर्म वही,
स्थान वही,
पर चेतना बदली हुई।
गांव में रहकर भी
बद्ध नहीं होना,
शहर में रहकर भी
खोना नहीं।
9. शहरनामा-सा निष्कर्ष
रिवर्स माइग्रेशन
रोजगार की वापसी नहीं,
गरिमा की वापसी है।
अंतिम पंक्ति
जिस दिन गांव
सिर्फ यादों का नहीं,
संभावनाओं का स्थान बनेगा—
उस दिन
ग्लोबल सपना
गांव का दुश्मन नहीं रहेगा।
दासानुदास चेदीराज दास
