जहाँ तीन शक्तियाँ आपस में बात करती हैं
नैमिषारण्य की परिक्रमा में चलते-चलते शहरनामा ने देखा—यहाँ सड़कें नहीं, विचार मुड़ते हैं।
और ऐसे ही एक मोड़ पर खड़ा है त्रिशक्ति धाम मंदिर। नाम पढ़ते ही लगा—यह कोई साधारण मंदिर नहीं, यह तो जीवन का संविधान है।
यहाँ त्रिशक्ति का मतलब बिजली नहीं, इच्छा–ज्ञान–कर्म है। शहरनामा मुस्कुराया—हमारे शहरों में इच्छा दौड़ती है, ज्ञान रुक-रुक कर आता है, और कर्म अक्सर ट्रैफिक में फँस जाता है। पर यहाँ तीनों एक साथ खड़े हैं—शांत, संतुलित, बिना शोर।
मंदिर में प्रवेश से पहले गणेश जी मिलते हैं।
शहरनामा समझ गया—यहाँ सीधे अंदर नहीं जाते, पहले समझ ली जाती है। विघ्नों से ज़्यादा, विघ्न-बोध की पूजा होती है। जैसे कोई कह रहा हो—“बिना दिशा के भक्ति भी भटक सकती है।”
भीतर शिव की गंभीरता है, विष्णु की संतुलित मुस्कान और दुर्गा की निर्भय ऊर्जा। शहरनामा ने सोचा—काश शहरों में भी ऐसा ही हो; जहाँ निर्णय शिव-सा गहरा हो, व्यवस्था विष्णु-सी स्थिर और हौसला दुर्गा-सा निर्भीक। तब शायद योजनाएँ काग़ज़ से उतरकर ज़मीन पर चलने लगें।
स्थापत्य दक्षिण का, भूमि उत्तर की—यह संगम बताता है कि भक्ति का पासपोर्ट नहीं होता। नैमिषारण्य वैसे भी ऐसा ही है—यहाँ शास्त्र सुनाए जाते हैं, और मौन सिखाया जाता है। त्रिशक्ति धाम उसी मौन का व्याकरण है।
शहरनामा ने यात्रियों को देखा—कोई जल्दी में नहीं, कोई माँगों की सूची लेकर नहीं। लोग यहाँ सुधार माँगने आते हैं, सफलता नहीं। शायद इसलिए निकलते हुए चेहरों पर शांति दिखती है—वह शांति जो तब आती है जब इच्छा शुद्ध हो, ज्ञान स्पष्ट हो और कर्म हल्का।
अंत में शहरनामा ने नोट किया—यह मंदिर चमत्कार का दावा नहीं करता। यह बस इतना कहता है कि जीवन में जो टूट रहा है, वह शक्ति की कमी से नहीं, संतुलन के अभाव से टूटता है।
और संतुलन—यहाँ मिल जाता है।
चुपचाप।
शुभ प्रभात..
दासानुदास चेदीराज दास
