
शहरनामा में आज
होली — जब रंग बाहर नहीं, भीतर उतरते हैं..
शहर फिर रंग खरीद रहा है।
कोई पिचकारी ठीक कर रहा है,
कोई चेहरे पर मुस्कान का अभ्यास।
पर होली—
सिर्फ़ गली में उड़ते गुलाल का नाम नहीं है।
होली दरअसल
भीतर जमा अंधेरों को जलाने का पर्व है।
पुराण याद दिलाते हैं कि
अग्नि में जला था अहंकार—
और सुरक्षित निकली थी भक्ति।
वह भक्ति किसी हथियार से नहीं,
एक बालक के भरोसे से बची थी—
प्रह्लाद महाराज।
और जो जली—
वह केवल एक देह नहीं थी,
वह उस सोच का अंत था
जो कहती है— “मैं ही सर्वोपरि हूँ।”
उस सोच का नाम था होलिका।
आज की होली में
होलिका हर घर में है—
कभी ईर्ष्या बनकर,
कभी घृणा बनकर,
कभी क्रोध और अहंकार बनकर।
और प्रह्लाद?
वह भी हर घर में है—
जब हम विपरीत हालात में भी
सच, करुणा और विश्वास नहीं छोड़ते।
शहरनामा कहता है—
इस होली पर
केवल रंग मत लगाइए,
भाव बदलिए।
क्रोध पर क्षमा का रंग
अहंकार पर विनय का गुलाल
द्वेष पर करुणा की अबीर
यही असली होली है।
होली की आध्यात्मिक बधाई
इस होली पर
आपके जीवन की हर होलिका जले,
और भीतर का प्रह्लाद
और उजला होकर निकले।
रंग आपके वस्त्रों पर नहीं,
आपके स्वभाव में चढ़ें।
आपका जीवन
माँ नर्मदा की धारा सा
स्वच्छ, शीतल और निरंतर बहता रहे।
होली की हार्दिक शुभकामनाएँ।
दासानुदास चेदीराज दास..
( संजीव डे राय )
