यह वही जगह है जहाँ आज का सेल्फ-हेल्प पोस्टर और गीता आमने-सामने खड़े हो जाते हैं। तो आइए, इसे स्पष्ट, निर्भीक और ज़मीन की भाषा में रखते हैं। कृष्ण-शरण बनाम पॉजिटिव थिंकिंग (या : दीवार पर लिखे वाक्य बनाम जीवन का आधार) 1. पॉजिटिव थिंकिंग क्या कहती है? आज का लोकप्रिय मंत्र— “सब ठीक हो जाएगा।” “मैं स्ट्रॉन्ग हूँ।” “नेगेटिव मत सोचो।” यह मन को समझाने की कोशिश है। पर समस्या यहीं है— मन ही समस्या का हिस्सा है। गीता पहले ही चेतावनी दे चुकी है— चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्। — (गीता 6.34) मन चंचल है, बलवान है, हठी है। उसे पोस्टर से नहीं हराया जा सकता। पॉजिटिव थिंकिंग अक्सर ऐसा करती है— भीतर आग लगी है ऊपर से मुस्कान चिपका दी 2. पॉजिटिव थिंकिंग का छुपा हुआ अहंकार ध्यान से देखें तो इसका मूल वाक्य होता है— “मैं कर लूँगा।” यही गीता की सबसे बड़ी आपत्ति है। क्योंकि— प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥ — (गीता 3.27) गुण काम कर रहे हैं, पर हम कहते हैं—“मैं कर रहा हूँ।” पॉजिटिव थिंकिंग अहंकार को पॉलिश करती है, कृष्ण-शरण अहंकार को सही जगह बिठाती है। 3. कृष्ण-शरण क्या कहती है? कृष्ण-शरण यह नहीं कहती— “सब ठीक हो जाएगा।” वह कहती है— “मैं सब संभाल रहा हूँ।” मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च। — (गीता 15.15) स्मृति भी मेरी, ज्ञान भी मेरा, भ्रम भी मेरे बिना नहीं। यानी समाधान मन के भीतर नहीं, केंद्र के परिवर्तन में है। 4. एक ही समस्या, दो दृष्टिकोण असफलता पॉजिटिव थिंकिंग: “अगली बार और ज़ोर लगाऊँगा।” कृष्ण-शरण: “हे कृष्ण, मेरी सीमा यही थी, अब आपकी बारी।” डर पॉजिटिव थिंकिंग: “डरना नहीं चाहिए।” कृष्ण-शरण: मा शुचः — (गीता 18.66) “डरो मत, मैं हूँ।” क्रोध पॉजिटिव थिंकिंग: “कूल रहो।” कृष्ण-शरण: “हे कृष्ण, यह क्रोध मैं नहीं हूँ।” 5. पॉजिटिव थिंकिंग क्यों टूट जाती है? क्योंकि जीवन हमेशा पॉजिटिव नहीं होता। मृत्यु, बीमारी, अपमान, अन्याय— इन पर सिर्फ “अच्छा सोचो” नहीं चलता। अर्जुन को भी यही कहा जा सकता था— “पॉजिटिव रहो, फोकस करो।” कृष्ण ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने कहा— न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः। — (गीता 2.12) यानी समस्या से पहले सत्य की नींव रखी। 6. कृष्ण-शरण: जड़ का इलाज आपने बिल्कुल ठीक कहा था— “कृष्ण को भूलना ही सारी समस्याओं की जड़ है।” पॉजिटिव थिंकिंग लक्षण का इलाज है। कृष्ण-शरण जड़ का। पॉजिटिव थिंकिंग कहती है— “मन बदलो।” कृष्ण-शरण कहती है— “मन के ऊपर जाओ।” 7. क्या पॉजिटिव थिंकिंग बेकार है? नहीं। लेकिन उसका स्थान सीमित है। गीता कहती है— श्रद्धावान्लभते ज्ञानम्। — (गीता 4.39) श्रद्धा चाहिए— पर श्रद्धा केंद्रहीन नहीं, कृष्ण-केंद्रित होनी चाहिए। पॉजिटिव थिंकिंग तब तक ठीक है जब तक वह कृष्ण-शरण की सहायक बने, उसकी जगह लेने न लगे। 8. एक पंक्ति में फ़र्क पॉजिटिव थिंकिंग कहती है— “मैं मजबूत हूँ।” कृष्ण-शरण कहती है— “मैं कमजोर हूँ, और वही मेरी ताकत है—क्योंकि कृष्ण हैं।”