8 प्रमुख रानियाँ और उनके प्रतीक
श्रीकृष्ण की 8 प्रमुख रानियों को ‘अष्टभार्या’ कहा जाता है। ये रानियाँ विभिन्न गुणों और शक्तियों का प्रतिनिधित्व करती थीं रुक्मिणी साक्षात लक्ष्मी देवी का स्वरूप जो समृद्धि और वैभव की प्रतीक थीं। सत्यभामा एक महान योद्धा और पराक्रमी जिनका जन्म सत्राजित के घर हुआ था। जाम्बवती जाम्बवंत की पुत्री, जो बल और साहस का प्रतीक थीं। कालिंदी सूर्यपुत्री, यमुना की देवी, जो जल तत्व और जीवन के प्रवाह का प्रतीक थीं। मित्रबिन्दा जो मित्रता और सौहार्द की प्रतीक थीं। सत्या सत्य और धर्म की आस्था रखने वाली। भद्रा जो शांति और संतुलन की प्रतीक थीं। लक्ष्मणा जो विवेक और आदर्श का पालन करने वाली थीं।
16,100 रानियों का उद्धार
इसके अलावा, श्रीकृष्ण ने 16,100 कन्याओं से विवाह किया जिनका अपहरण असुर राजा नरकासुर ने किया था। नरकासुर एक अत्याचारी और दुराचारी राजा था, जिसने इन कन्याओं को बंदी बना लिया था और उन्हें अपमानित किया था। श्रीकृष्ण ने इस असुर का वध किया और इन कन्याओं को नरकासुर के बंदीगृह से मुक्त कराकर उनका सम्मान बढ़ाया। जब इन कन्याओं ने श्रीकृष्ण से आशीर्वाद मांगा, तो उन्होंने उन्हें अपनी पतिव्रता रानियों की तरह सम्मान दिया। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने न केवल इन कन्याओं को सामाजिक सम्मान प्रदान किया बल्कि यह भी प्रमाणित किया कि एक सशक्त और स्वतंत्र नारी को सम्मान मिलना चाहिए और उसकी अस्मिता का हनन किसी भी परिस्थिति में नहीं होना चाहिए।
आध्यात्मिक संदेश
श्रीकृष्ण की यह लीला सामाजिक न्याय और समानता का प्रतीक मानी जाती है। उनका विवाह इन 16,100 रानियों से यह दिखाता है कि वह हर एक व्यक्ति की अस्मिता और सम्मान की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध थे। यह संदेश हमें बताता है कि समाज में सभी व्यक्तियों को बराबरी का दर्जा और सम्मान मिलना चाहिए चाहे वह पुरुष हो या महिला। श्रीकृष्ण का जीवन हमें यह भी सिखाता है कि सच्चे प्रेम और त्याग की कोई सीमा नहीं होती। उनका यह विवाह केवल एक पौराणिक घटना नहीं बल्कि एक गहरी सामाजिक और आध्यात्मिक शिक्षा का प्रतीक है।
