आज श्रीमद् भगवत गीता कॉलेज केंपस की चहल-पहल और गांव से उठती खामोश आह के बीच लिखा गया शहरनामा ..
न कोई nostalgia, न कोई ग़ुस्सा—बस यथार्थ।
कॉलेज कैंपस, कोचिंग संस्कृति
और गांव से शहर की ओर निकलता युवा..
(या जब भविष्य का पता बदल जाता है)
गांव से निकलते समय
मां दरवाज़े पर खड़ी रहती है,
और बेटा मन ही मन सोचता है—
“अब लौटना योग्यता पर निर्भर है।”
1. कैंपस: सपनों की प्रयोगशाला
कॉलेज कैंपस अब
केवल पढ़ाई की जगह नहीं रहा।
यह प्लेसमेंट की प्रयोगशाला है।
यहाँ दोस्ती भी नेटवर्किंग है,
और सवाल भी इंटरव्यू-रेडी।
गीता कहती है—
कर्मण्येवाधिकारस्ते
— (गीता 2.47)
लेकिन कैंपस कहता है—
“आउटकम दिखाओ।”
2. कोचिंग संस्कृति: आशा का उद्योग
कोचिंग शहरों में
होर्डिंग्स नहीं,
विश्वास बिकता है।
हर क्लासरूम में
एक ही सपना—
“इस बार मेरा हो जाएगा।”
पर हर चयन के पीछे
सैकड़ों असफल चेहरे।
गीता चुपचाप याद दिलाती है—
फलहेतवो न कर्मणि
पर कोचिंग की दीवारों पर
फल ही सब कुछ है।
3. गांव छोड़ता युवा: मजबूरी या महत्वाकांक्षा?
आज गांव से शहर जाना
रोमांच नहीं,
आवश्यकता है।
गांव में श्रम है,
पर सम्मान नहीं।
युवा जानता है—
अगर यहीं रहा,
तो “काबिल” कहलाने का मौका नहीं मिलेगा।
4. शहर: अवसरों का शोर
शहर सब कुछ देता है—
कोचिंग
कॉलेज
कैफ़े
कॉम्पिटिशन
लेकिन एक चीज़ छीन भी लेता है—
पहचान का आराम।
यहाँ कोई “फलां का बेटा” नहीं,
सब “रोल नंबर” हैं।
5. कैंपस में पैदा होता नया तनाव
रिज़्यूमे बेहतर होना चाहिए
इंटर्नशिप होनी चाहिए
एक्स्ट्रा करिकुलर भी चाहिए
नतीजा—
युवा पढ़ाई कम,
खुद की तुलना ज़्यादा करता है।
गीता इसे पहले ही पहचान चुकी है—
द्वन्द्वमोहेन भारत
— (गीता 7.27)
6. गांव की खाली होती गलियाँ
पीछे छूट जाता है—
बुजुर्ग पिता
खाली स्कूल
सूने खेत
गांव में अब
त्योहार भी वीडियो कॉल पर मनते हैं।
और गांव पूछता है—
“हमसे गलती क्या हुई?”
7. सफलता का नया पैमाना
अब सफलता का मतलब—
पैकेज
पोस्टिंग
प्रोफ़ाइल
पर मन के अंदर
अक्सर सवाल उठता है—
“अगर सब मिल गया,
तो घर क्यों याद आता है?”
8. गीता की दृष्टि: स्थान नहीं, स्थिति बदलो
कृष्ण यह नहीं कहते— “शहर मत जाओ।”
वे कहते हैं—
स्वधर्मे निधनं श्रेयः
— (गीता 3.35)
अपना धर्म पहचानो,
चाहे गांव में हो या शहर में।
9. शहरनामा-सा निष्कर्ष
गांव से शहर जाने वाला युवा
दरअसल नौकरी नहीं खोजता,
स्वीकृति खोजता है।
और शहर—
उसे मौका तो देता है,
पर अपनापन नहीं।
अंतिम पंक्ति
जिस दिन गांव में भी
योग्यता को सम्मान मिलेगा,
उस दिन शहर
इतना जरूरी नहीं रहेगा।