
शहरनामा :
जिह्वा पर नाम, शहर में क्रांति…
शहर की एक गली है—न बहुत चौड़ी, न बहुत साफ़। सुबह-सुबह वहाँ कचरा गाड़ी आती है, लोग नाक पर रुमाल रख लेते हैं और मन में एक अदृश्य लकीर खींच लेते हैं—“ये हमारी दुनिया नहीं है।”
उसी गली में रहने वाला श्यामू रोज़ सुबह झाड़ू लगाते हुए कुछ बुदबुदाता है। पास से गुजरते लोग सुनते हैं—
“हरे कृष्ण… हरे कृष्ण…”
कोई ध्यान नहीं देता। आखिर शहर में मंत्रों की क़ीमत क्या है, यहाँ तो केवल मीटर और मीटिंग चलती है।
लेकिन राजा कुलशेखर आज होते, तो शायद नगर निगम की इस गली में खड़े होकर वही पंक्ति दोहराते—
अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान्
यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्।
अहो! आश्चर्य है—जिसे शहर श्वपच समझकर आँखें फेर लेता है, यदि उसकी जिह्वा पर भगवान का नाम है, तो वह शहर के सारे “वीआईपी पास” वालों से भारी है।
डिग्री, जाति और गेट पास
शहर आजकल योग्यता को डिग्री से नापता है,
सम्मान को कुर्सी से,
और पवित्रता को कपड़ों से।
श्यामू के पास न डिग्री है, न कुर्सी, न कुर्ता।
लेकिन उसके पास एक चीज़ है—नाम।
गीता कहती है—
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति (9.26)
भगवान कहते हैं—भाव देखता हूँ, बैलेंस शीट नहीं।
शहर कहता है—पहले पहचान दिखाओ, फिर अंदर आओ।
तपस्या AC हॉल में नहीं होती
शहर में तपस्या भी अपडेट हो गई है—
एसी हॉल, योगा मैट, इंस्टाग्राम रील।
लेकिन श्यामू की तपस्या देखिए—
गर्मी, बदबू और उपेक्षा के बीच
नाम का स्मरण।
कुलशेखर कहते हैं—
तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या
जिसकी जीभ पर नाम है,
समझो उसने सब कर लिया—
चाहे शहर उसे “अनस्किल्ड” कहे।
समान दृष्टि का ट्रैफिक सिग्नल
शहर में लाल बत्ती पर सब रुकते हैं,
लेकिन दृष्टि कहीं नहीं रुकती।
ब्राह्मण हो या श्रमिक—
दृष्टि का लेन बदलता रहता है।
गीता याद दिलाती है—
विद्याविनयसम्पन्ने… शुनि चैव श्वपाके च (5.18)
ज्ञानी वही है
जो श्वपच में भी वही आत्मा देखे
जो खुद में देखता है।
पर शहर को आत्मा नहीं दिखती,
उसे सिर्फ़ “पोस्ट” दिखती है।
वेदों का सार और शहर का शोर
शहर में ज्ञान सेमिनार में मिलता है,
टिकट के साथ।
लेकिन कुलशेखर कहते हैं—
ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते
जो नाम गाता है,
उसने वेद पढ़ लिए।
गीता भी साफ़ कहती है—
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः (15.15)
पर शहर अब भी पूछता है—
“आपने कौन-सा कोर्स किया है?”
शहरनामा का निष्कर्ष
इस शहर में
नाम लेने से कुछ नहीं मिलता—
न नौकरी, न पुरस्कार, न विज्ञापन।
लेकिन नाम लेने से
जो मिलता है,
वह शहर के किसी बजट में नहीं आता—
गरिमा।
श्यामू झाड़ू लगाता है,
शहर साफ़ करता है,
और नाम लेकर
अपने भीतर का शहर बचा लेता है।
और हम?
हम फ्लैट की बालकनी से झाँकते हैं,
नाक सिकोड़ते हैं,
और सोचते हैं—
धर्म कहीं और होगा।
शहरनामा बस इतना कहता है—
जिसकी जिह्वा पर नाम है,
वह शहर की भीड़ में नहीं,
भगवान की दृष्टि में रहता है।
हरे कृष्ण..
दासानुदास चेदीराज दास
