
श्रीमद् भगवत गीता मिट्टी, मोबाइल और मार्केट की संगम कथा..
न पोस्टर-आशावाद, न कॉर्पोरेट स्लोगन—गांव के भीतर उगता उद्यम।
गांव में स्टार्टअप संस्कृति
(या जब उद्यम की जड़ें शहर में नहीं, मिट्टी में हों)
एक समय था—
गांव में व्यापार करना
“मजबूरी” कहलाता था।
आज वही काम
“स्टार्टअप” कहलाने लगा है।
नाम बदला है,
पर जमीन वही है।
1. गांव का स्टार्टअप क्या होता है?
गांव का स्टार्टअप
ऐप से नहीं,
समस्या से शुरू होता है।
पानी की कमी
भंडारण का अभाव
बिचौलियों का जाल
पलायन
यहाँ “पिच डेक” से पहले
पंचायत होती है।
2. शहर का स्टार्टअप बनाम गांव का स्टार्टअप
शहर कहता है— “स्केल कैसे होगा?”
गांव पूछता है— “काम चलेगा या नहीं?”
शहर में यूज़र है,
गांव में पड़ोसी।
गलती का असर
डाउनलोड नहीं,
रिश्तों पर पड़ता है।
3. डिजिटल साधन, देसी समाधान
आज गांव के पास—
यूपीआई
व्हाट्सएप बिज़नेस
ई-नाम
यूट्यूब ज्ञान
एक किसान
खुद की फसल बेच रहा है,
और कीमत भी खुद तय कर रहा है।
4. महिलाएं: गांव की असली उद्यमी
गांव में
महिला स्टार्टअप
नई चीज़ नहीं है।
वे पहले से—
स्वयं सहायता समूह
डेयरी
आचार-पापड़
बीज संरक्षण
बस फर्क यह है—
अब लाभ दिखने लगा है।
5. स्टार्टअप नहीं, स्वरोज़गार की संस्कृति
गांव को
यूनिकॉर्न नहीं चाहिए।
उसे चाहिए—
स्थिर आय
स्थानीय रोज़गार
सम्मान
गीता कहती है—
स्वधर्मे निधनं श्रेयः
— (गीता 3.35)
अपना काम
अपनी शर्तों पर।
6. निवेश नहीं, भरोसा चाहिए
गांव में
सबसे बड़ा पूंजी— विश्वास है।
यहाँ निवेशक
शेयर नहीं मांगता,
ईमानदारी देखता है।
7. खतरे और सावधानियां
कॉर्पोरेट कब्ज़ा
जमीन का कमोडिफिकेशन
“फ्रैंचाइज़ गांव”
स्थानीय ज्ञान की चोरी
अगर सावधान नहीं रहे,
तो गांव सिर्फ
कच्चा माल बन जाएगा।
8. कृष्ण-केंद्रित दृष्टि
कृष्ण कहते हैं—
योगः कर्मसु कौशलम्
— (गीता 2.50)
कर्म वही—
खेत, पशु, कुटीर उद्योग।
पर चेतना—
शोषण नहीं
संतुलन
सेवा भाव
9. शहरनामा-सा निष्कर्ष
गांव का स्टार्टअप
मुनाफ़े से पहले
पलायन रोकता है।
अंतिम पंक्ति
जिस दिन गांव
नौकरी देने लगेगा,
उस दिन शहर
इतना भारी नहीं लगेगा।
दासानुदास चेदीराज दास
