
शहरनामा में आज..:
चैनल वाला धर्म और कृष्ण का धर्म..
शहर में इन दिनों एक नया मौसम है—न बारिश का, न चुनाव का; यह धर्म-प्रवचन चैनलों का मौसम है। हर गली में एक स्टूडियो, हर स्टूडियो में एक स्वयंभू सुधारक। भाषा में “यूँ, जी, सी” की शालीनता और विचारों में पुरानी छुआछूत का ज़हर। ये सज्जन अपने को हिंदुओं का मार्गदर्शक बताते हैं, पर दिशा ऐसी कि समाज एक नहीं, टुकड़ों में चल पड़े।
“हिंदू एकता” के नाम पर चलने वाले चैनलों में रोज़ कोई न कोई नमो-शूद्र, शूद्र-अतिशूद्र शब्द उछाला जाता है—मानो सम्मान नहीं, राशन बाँटा जा रहा हो। आश्चर्य यह कि इन्हें न इतिहास का भय है, न वर्तमान की शर्म। इन्हें बस टीआरपी दिखती है; समाज दिखता नहीं।
इतिहास बताता है कि जब-जब हिंदू समाज ने अपने ही लोगों को मनुष्य से पहले वर्ग माना, तब-तब लोग धर्म नहीं—अपमान छोड़कर गए। सिंध, बंगाल, पूर्वी बंगाल—सबके पन्ने इसी स्याही से लिखे हैं। आज का बांग्लादेश इसका जीवित प्रमाण है, जहाँ कभी सनातन की घंटियाँ बजती थीं और आज आँकड़े सवाल पूछते हैं—किससे डरे, बाहर से या भीतर से?
अब ज़रा उस धर्म की बात करें, जिसे ये चैनल वाले रोज़ बेचते हैं। क्या वह वही धर्म है जो भगवान कृष्ण ने दिया था? श्रीमद्भगवद्गीता में कृष्ण साफ़ कहते हैं—
“चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।”
अर्थात् वर्ण गुण-कर्म से है, जन्म-लेबल से नहीं। पर हमारे स्टूडियो-साधु जन्म से ही ठप्पा लगा देते हैं—और उसे धर्म का सर्टिफिकेट भी दे देते हैं।
कृष्ण तो आगे जाकर कसौटी रख देते हैं—
“विद्याविनयसंपन्ने… श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।”
ज्ञानी वह है जो सबमें एक आत्मा देखे। अब बताइए, जो कैमरे के सामने बैठकर अपमान परोसता है, वह ज्ञानी है या सिर्फ़ एंकर-ज्ञानी?
शहर पूछता है—हिंदू एकता की बात करते हुए हिंदू को ही क्यों काटा जा रहा है? अगर एकता इतनी ही प्रिय है, तो शब्दों में जहर क्यों? क्यों नहीं याद आता—
“स्वधर्मे निधनं श्रेयः।”
हिंदू का स्वधर्म है समरसता; अपमान नहीं।
सावधान, शहर के हिंदुओ!
हर भगवा ज्ञान नहीं होता, हर ऊँची आवाज़ सत्य नहीं होती।
कृष्ण का धर्म जोड़ता है; चैनल वाला धर्म तोड़ता है।
आज भी समय है—कृष्ण को चुनिए, पाखंड को नहीं।
क्योंकि इतिहास इंतज़ार नहीं करता; वह दोहराता है।
दासानुदास चेदीराज दास
