इस दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालु पूरे दिन भगवान का ध्यान और भजन कर मन और शरीर को शुद्ध करते हैं वरुथिनी एकादशी के दिन अनाज जैसे चावल गेहूं और दालें बिल्कुल नहीं खानी चाहिए क्योंकि इन्हें पचाना कठिन होता है और ये व्रत में ध्यान भंग कर सकते हैं साथ ही बीन्स मटर और भारी भोजन भी वर्जित हैं चाय कॉफी और एनर्जी ड्रिंक्स जैसी कैफीनयुक्त चीजें नहीं लेनी चाहिए इस दिन केवल सात्विक भोजन या फलाहार ही उचित माना गया है मांस मछली प्याज लहसुन जैसी तामसिक वस्तुएं भी वर्जित हैं
वरुथिनी एकादशी पर तुलसी की पूजा विशेष महत्व रखती है इसलिए इस दिन तुलसी के पत्ते न तोड़े जाएं और घर में तुलसी का स्थान पवित्र रखा जाए व्रत के दिन बाल धोने से भी परहेज किया जाता है क्योंकि यह दिन आध्यात्मिक शुद्धि और ध्यान का दिन होता है
इस दिन भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा करने से विशेष लाभ होता है और जीवन में शांति तथा आत्मिक संतोष प्राप्त होता है यह व्रत श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी और शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को भी इसका महत्व बताया था राजा परीक्षित ने अपने अंतिम समय में इस व्रत और भगवान की भक्ति के माध्यम से मोक्ष का मार्ग पाया था यही कारण है कि वरुथिनी एकादशी का व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है
इस साल वरुथिनी एकादशी का शुभ मुहूर्त 13 अप्रैल को रात 01 बजकर 16 मिनट से शुरू होकर 14 अप्रैल को रात 01 बजकर 08 मिनट पर समाप्त होगा श्रद्धालु इस समय के अनुसार व्रत का पालन और पूजा कर सकते हैं व्रत पूर्ण करने के बाद पारण किया जाता है जिसमें हल्का सात्विक भोजन लिया जा सकता है
वरुथिनी एकादशी व्रत रखने से न केवल आध्यात्मिक लाभ होते हैं बल्कि शरीर और मन की शुद्धि भी होती है इससे व्यक्ति का मनोबल बढ़ता है और वह जीवन में सकारात्मक ऊर्जा के साथ आगे बढ़ता है इस दिन का ध्यान और भक्ति जीवन में सुख समृद्धि और शांति का मार्ग खोलती है
