
शहरनामा में आज-:
जब भोर हो जाती है… पर भक्ति नहीं जागती…
शहर की सुबहें अजीब होती हैं।
सूरज समय पर निकल आता है, पक्षी चहचहाने लगते हैं, दूधवाले की साइकिल गलियों में खनकती है—पर कई घरों की खिड़कियाँ अब भी बंद रहती हैं।
मंदिरों की सुबह भी कभी-कभी ऐसी ही हो जाती है।
ब्रह्ममुहूर्त का वह पवित्र समय—जब प्रकृति स्वयं साधना की मुद्रा में होती है—मंदिर की घंटी बजती है, दीपक जलता है, आरती की लौ उठती है… पर सामने खड़े भक्तों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सके, तो यह दृश्य केवल मंदिर का नहीं, हमारी चेतना का आईना बन जाता है।
भक्ति का पहला नियम है—नियम।
और पहला परीक्षण है—प्रातःकाल।
शास्त्रों में कहा गया है—
ब्राह्मे मुहूर्त उत्तिष्ठेत् स्वस्थो रक्षार्थमायुषः।
अर्थात — ब्रह्ममुहूर्त में उठना जीवन की रक्षा और आत्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है।
क्योंकि यही वह समय है जब आत्मा सबसे स्पष्ट रूप से भगवान को पुकार सकती है।
मगर आज का मनुष्य अजीब दुविधा में है—
रात देर तक संसार के लिए जागता है, और सुबह भगवान के लिए सोता है।
शास्त्र बार-बार चेताते हैं—
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढ़व्रताः।
(भगवद्गीता)
अर्थात — मेरे भक्त निरंतर मेरा कीर्तन करते हैं और दृढ़ संकल्प के साथ मेरी उपासना करते हैं।
ध्यान दीजिए—यहाँ “दृढ़व्रत” शब्द आया है।
भक्ति भावना से शुरू होती है, पर दृढ़ता से टिकती है।
मंगल आरती कोई औपचारिक कार्यक्रम नहीं है।
यह वह क्षण है जब भगवान को दीप दिखाते समय भक्त अपने भीतर के अंधकार को भी जलाकर समाप्त करने का संकल्प लेता है।
एक संत ने कहा था—
“जो भक्त भगवान को जगाने नहीं आता, वह धीरे-धीरे अपने भीतर के भगवान को भी सुला देता है।”
प्रह्लाद को याद कीजिए।
उन्हें न मंदिर मिला, न आरती, न संगति—फिर भी उनकी भक्ति अटल रही।
और हम?
हमारे पास मंदिर है, घंटी है, मृदंग है, संगति है—पर कभी-कभी मन ही अनुपस्थित हो जाता है।
भागवत में भक्ति का सरल सूत्र बताया गया है—
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
इन सबमें सबसे सरल साधना है—संग में कीर्तन और आरती।
क्योंकि जब अनेक हृदय मिलकर भगवान का नाम लेते हैं, तो वह ध्वनि केवल मंदिर की दीवारों में नहीं गूंजती—वह मनुष्य के भीतर छिपे हुए भगवान को भी जगा देती है।
सच तो यह है कि मंदिर की आरती भगवान को जगाने से अधिक भक्तों को जगाने के लिए होती है।
जब मृदंग की पहली थाप पड़ती है, तो वह एक प्रश्न भी करती है—
“क्या आज भी तुम्हारी आत्मा सोई रहेगी?”
शहर की व्यस्तता अपनी जगह है, जीवन की जिम्मेदारियाँ भी अपनी जगह हैं।
पर यदि भगवान के लिए दिन में एक क्षण भी न बचे, तो फिर यह जीवन किसके लिए है?
इसलिए अगली बार जब भोर हो और मंदिर की घंटी बजे, तो एक क्षण ठहर कर सोचिए—
सूरज तो हर दिन उगता है…
पर भक्ति का सूर्योदय हर दिन नहीं होता।
और जिस दिन वह हो जाए, समझिए वही दिन वास्तव में जीवन की सच्ची सुबह है।
— दासानुदास चेदीराज दास
(शहरनामा)
