
शहरनामा में आज -:
जब भक्ति भी सुविधा की गुलाम हो जाए….
शहर की एक अजीब आदत है—
वह हर चीज़ को धीरे-धीरे सुविधा में बदल देता है।
काम सुविधा से, रिश्ते सुविधा से, और अब तो भक्ति भी सुविधा से होने लगी है।
समय मिला तो मंदिर,
मन हुआ तो कीर्तन,
और अगर नींद थोड़ी भारी हो गई तो भगवान भी समझदार हैं—यह सोचकर फिर से चादर ओढ़ ली जाती है।
कभी-कभी लगता है कि हम भगवान की शरण में नहीं गए, बल्कि भगवान को ही अपनी सुविधा के अनुसार बुला लिया है।
शास्त्रों में भक्ति को “अनन्य” कहा गया है—
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
(भगवद्गीता)
अर्थात — जो भक्त निरंतर और अनन्य भाव से मेरी उपासना करते हैं, उनके योग-क्षेम का भार मैं स्वयं उठाता हूँ।
ध्यान दीजिए—यहाँ “निरंतर” शब्द आया है।
भक्ति का अर्थ है निरंतरता, न कि अवसर मिलने पर स्मरण।
आज का भक्त कभी-कभी बड़ा व्यस्त हो गया है।
भगवान के लिए समय निकालना कठिन हो जाता है, पर मोबाइल देखने के लिए समय अपने-आप निकल आता है।
मंदिर की आरती का समय भी अब कई लोगों के लिए एक विकल्प बन गया है—
जाना भी है और नहीं भी जाना है।
पर भक्ति विकल्प नहीं होती।
भक्ति तो वह संकल्प है जो परिस्थितियों से ऊपर खड़ा रहता है।
संत कहा करते थे—
“जिस दिन भगवान के लिए समय निकालना पड़े, समझ लो उस दिन संसार ने तुम्हें जीत लिया।”
भागवत में भक्ति का सरल सूत्र दिया गया है—
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
इनमें से कोई भी साधना सुविधा से नहीं होती,
संकल्प से होती है।
प्रह्लाद को याद कीजिए।
उनके सामने न सुविधा थी, न वातावरण, न सुरक्षा।
फिर भी उनकी भक्ति अडिग रही।
और आज?
हमारे पास मंदिर है, संगति है, समय भी है—
पर कभी-कभी मन कहता है, “आज रहने दो।”
यही वह क्षण है जब भक्ति धीरे-धीरे सुविधा की दासी बन जाती है।
शहरनामा की भाषा में कहें तो—
जब भक्ति सुविधा की गुलाम बन जाए, तब मंदिर की घंटी भी प्रश्न बन जाती है।
वह पूछती है—
“क्या तुम्हारा भगवान भी अब तुम्हारे समय का इंतज़ार करेगा?”
सच तो यह है कि भगवान को हमारी उपस्थिति की आवश्यकता नहीं,
पर हमारी आत्मा को भगवान की आवश्यकता अवश्य है।
इसलिए भक्ति को सुविधा से नहीं, संकल्प से जोड़िए।
क्योंकि सुविधा से किया गया स्मरण कभी-कभी छूट जाता है,
पर संकल्प से की गई भक्ति जीवन भर साथ रहती है।
और याद रखिए—
भक्ति का मार्ग आसान नहीं, पर सच्चा है।
क्योंकि जहाँ सुविधा समाप्त होती है,
वहीं से समर्पण की शुरुआत होती है।
दासानुदास चेदीराज दास
